समयसार गाथा ७४ ] [ ८७ व्यवहारवाळाना व्यवहारने तो कोई आरोप लागु ज पडतो नथी. आवी वात छे. आ छठ्ठो बोल घणो गंभीर छे!
अरे! लोकोए-अज्ञानीओए वीतराग मार्गने तोड-फोड करीने चूंथी नाख्यो छे! पराश्रयथी जे भाव थयो ते राग छे, आस्रव छे, दुःखरूप छे अने भविष्यमां दुःखनुं कारण छे. परंतु एने चूंथवा मांडे अने कहे के आम (शुभभाव) करतां करतां धर्म थशे. पण वस्तुस्थिति एम नथी. भाई! आ बोलमां अहीं स्पष्ट कह्युं छे के आस्रवो आगामी काळमां आकुळताने उत्पन्न करनारा एवा पुद्गलपरिणामना हेतु होवाथी दुःखफळ छे, दुःख जेमनुं फळ छे एवा छे.
‘जीव ज समस्त पुद्गलपरिणामनो अहेतु होवाथी अदुःखफळ छे’. अहाहा...! भगवान आत्मा ज्ञायक प्रभु ज्ञाता-द्रष्टा निर्विकल्प निराकुळ आनंदस्वरूप भगवान छे; ते समस्त पुद्गलपरिणामनो अहेतु छे. तीर्थंकर प्रकृतिनो बंध थाय तेनो जीव हेतु नथी, तेनो हेतु तो शुभभाव छे. इन्द्र-अहमिंद्र, चक्री आदि भव मळे ते भव आकुळता उत्पन्न थवानुं निमित्त छे, आत्मानी शांति-समाधिनुं नहि. जीव ज समस्त पुद्गल-परिणामनो अहेतु होवाथी अदुःखफळ छे.
भाई! वीतरागनो मार्ग घणो निर्मळ, स्वच्छ छे. पण लोकोए पोतानी मति- कल्पनाथी ऊंधा अर्थ करीने चूंथी नाख्यो छे. पुद्गलपरिणाम जे १४८ कर्मप्रकृतिना भेदो छे ते कर्म परिणामनो जीव अहेतु छे. जीवने लईने कोई कर्मनी प्रकृति बंधाय छे एम छे ज नहि. जीव तो एक ज्ञायकभाव छे. ते कोईपण प्रकृतिना बंधनो हेतु थाय एवुं एनुं स्वरूप नथी.
आ अधिकारनी गाथा १०पमां कह्युं छे के-“आ लोकमां खरेखर आत्मा स्वभावथी पौद्गलिक कर्मने निमित्तभूत नहि होवा छतां पण, अनादि अज्ञानने लीधे पौद्गलिक कर्मने निमित्तरूप थता एवा अज्ञानभावे परिणमतो होवाथी निमित्तभूत थतां, पौद्गलिक कर्म उत्पन्न थाय छे, तेथी ‘पौद्गलिक कर्म आत्माए कर्युं’ एवो निर्विकल्प विज्ञान- घनस्वभावथी भ्रष्ट विकल्पपरायण अज्ञानीओनो विकल्प छे; ते विकल्प उपचार ज छे, परमार्थ नथी.”
जुओ, जडकर्म आत्माए कर्युं ए उपचार कथन छे. खरेखर तो जीव पोताना अज्ञाननो कर्ता छे, पुद्गलपरिणामनो कर्ता नथी. अहीं तो एम सिद्ध करवुं छे के आत्मा खरेखर स्वभावनी द्रष्टिथी जोतां कोई पण प्रकृतिना बंधनुं निमित्त नथी, चिन्मात्र वस्तु ज्ञायकभावरूप आत्मा निमित्त केम थाय? माटे अहीं कहे छे के जीव ज समस्त पुद्गलपरिणामनो अहेतु होवाथी अदुःखफळ छे. अहाहा...! त्रिकाळी शुद्ध ज्ञानानंद-स्वभावी जे ध्रुव ज्ञायकमूर्ति प्रभु आत्मा छे तेनां श्रद्धान-ज्ञान-रमणता कोई पुद्गल-