Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


PDF/HTML Page 860 of 4199

 

८८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ परिणामनो हेतु नथी; माटे ते दुःखरूप नथी, परंतु वर्तमानमां पण एकांत सुखरूप छे अने भविष्यना सुखफळरूप छे.

हवे कहे छे-‘आम आस्रवोनुं अने जीवनुं भेदज्ञान थतां वेंत ज जेनामां कर्मविपाक शिथिल थई गयो छे एवो ते आत्मा, जथ्थाबंध वादळांनी रचना जेमां खंडित थई गई छे एवा दिशाना विस्तारनी जेम अमर्याद जेनो विस्तार छे एवो, सहजपणे विकास पामती चित्शक्ति वडे जेम जेम विज्ञानघनस्वभाव थतो जाय छे तेम तेम आस्रवोथी निवृत्त थतो जाय छे.

आस्रवो अने आत्मानुं अहीं छ प्रकारे भेदज्ञान कराव्युं-

१. आस्रवो घातक छे, पर्याय वध्य छे. २. आस्रवो अध्रुव छे, भगवान आत्मा ज ध्रुव छे. ३. आस्रवो अनित्य छे, भगवान आत्मा ज नित्य छे. ४. आस्रवो अशरण छे, भगवान आत्मा ज शरण छे. प. आस्रवो दुःखरूप छे, भगवान आत्मा ज अदुःखरूप छे. ६. आस्रवो पुण्य-पाप बंधना हेतु होवाथी दुःखफळरूप छे, भगवान आत्मा ज पुण्य-

पाप बंधनो अहेतु होवाथी अदुःखफळरूप छे.

आ प्रमाणे भेदज्ञान थतां वेंत ज, चैतन्यस्वरूप भगवान ज्ञायकनुं भान थतां वेंत ज जेनामां कर्मनो विपाक शिथिल-ढीलो पडी गयो छे ते आत्मा आस्रवोथी-मिथ्यात्वथी निवृत्त थई जाय छे.

जथ्थाबंध वादळांनी रचना खंडित थई जतां जेम सूर्यनो प्रकाश दिशाओमां सर्वत्र विस्तरे छे, दिशाओ निर्मळ थई जाय छे तेम अमर्यादित जेनो विस्तार छे एवा आत्मानी सहज ज्ञानकळा खीली जाय छे. इन्द्रियथी, कर्मथी, रागथी ज्ञानने भिन्न पाडतां ज्ञाननो विकास थईने ज्ञान विज्ञानघन थई गयुं, अने पुद्गल कर्म ढीलुं पडीने अभावरूप थई गयुं. पोतानी सहज चित्शक्ति वडे पोते ज्ञानमां स्थिर थई गयो, द्रढ जामी गयो. अहाहा...! वस्तु तो विज्ञानघन छे. भेदज्ञानना बळे पोते पर्यायमां जेम जेम विज्ञानघन थतो जाय छे तेम तेम आस्रवोथी निवृत्त थतो जाय छे.

बहारनुं ज्ञान ओछुं-वत्तु होय तेनी साथे अहीं संबंध नथी. अहीं तो वस्तु आत्मा जे मूळ विज्ञानघनस्वभाव छे तेमां एकाग्रता अने स्थिरता करीने पर्यायमां जे विज्ञानघनस्वभाव थतो जाय छे एनी वात छे. रागथी भिन्न पडतां ज्ञानमां ज्ञान जाम्युं अने त्यां कर्मबंध शिथिल थई गया अने आस्रवो गळी गया. अहाहा! विज्ञान-घनस्वभाव थतो जाय छे एम कहीने अंतर्मुख पुरुषार्थनी वात करी छे. जुओ! कर्म घटवा मांडे तेम तेम विज्ञानघन थतो जाय छे एम नथी कह्युं. ज्ञानमां एकाग्र थतां