Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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९० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४

* गाथा ७४ः भावार्थ उपरनुं प्रवचन *

‘आस्रवोनो अने आत्मानो उपर कह्यो ते रीते भेद जाणतां ज, जे जे प्रकारे जेटला जेटला अंशे आत्मा विज्ञानघनस्वभाव थाय छे ते ते प्रकारे तेटला तेटला अंशे ते आस्रवोथी निवर्ते छे. ज्यारे संपूर्ण विज्ञानघनस्वभाव थाय छे त्यारे समस्त आस्रवोथी निवर्ते छे. आम ज्ञाननो अने आस्रवनिवृत्तिनो एक काळ छे.’ गाथा ७२मां पण ‘णादूण’ शब्द हतो. अहीं पण ए ज कह्युं के आस्रवोथी भिन्न चैतन्यस्वरूप आत्माने जाणीने जेटलो ज्ञानानंदस्वभावमां ठर्यो-स्थिर थयो तेटलो आस्रवोथी निवर्ते छे. अने जेटलो आस्रवोथी छूटयो तेटलो स्वरूपस्थिर विज्ञानघन थाय छे. अहाहा...! जेटलो धर्म प्रगट थाय तेटलो अधर्मथी निवृत्त थाय अने जेटलो अधर्म-आस्रवथी निवृत्त थाय तेटलो धर्ममां स्थिर थाय छे, तेटलां संवर-निर्जरा थाय छे.

‘आ आस्रवो टळवानुं अने संवर थवानुं वर्णन गुणस्थानोनी परिपाटीरूपे तत्त्वार्थसूत्रनी टीका आदि सिद्धांतशास्त्रोमां छे त्यांथी जाणवुं. अहीं तो सामान्य प्रकरण छे तेथी सामान्यपणे कह्युं छे.’ आ पच्चकखाण करो, सामायिक करो, पोसा करो, प्रतिक्रमण करो, आ त्याग करो, ते करो इत्यादि करो तो धर्म थाय, संवर थाय एम लोको माने छे. पण ते बराबर नथी. आस्रव अने आत्माने भिन्न जाण्या नथी त्यां संवर केवो? जेनो वीतराग विज्ञानस्वभाव छे एवा आत्मामां ढळ्‌या विना आस्रवथी निवृत्ति थाय नहि अने त्यां सुधी संवर प्रगट थाय नहि. अहा! पुण्य-पापना विषमभावथी भेदज्ञान थया विना समता जेनुं मूळ छे एवी सामायिक केम थाय? न थाय. बापु! मन-वचन-कायानी सरळतारूप प्रवृत्तिथी पुण्य बंधाय, पण धर्म न थाय. कह्युं ने अहीं के ते (शुभ) भावो दुःखरूप अने दुःखफळरूप छे, पण धर्म नथी. धर्म तो स्वनो आश्रय लईने एमां ज ठरे तो प्रगट थाय छे. आवुं ज वस्तुस्वरूप छे त्यां थाय शुं? प्रश्नः– ‘आत्मा विज्ञानघनस्वभाव थतो जाय छे एटले शुं?’ तेनो उत्तरः–

उत्तरः– ‘आत्मा विज्ञानघनस्वभाव थतो जाय छे एटले आत्मा ज्ञानमां स्थिर थतो जाय छे.’ ज्ञानस्वरूप भगवान आत्मा पोतामां स्थिर थतो जाय, ठरतो जाय तेने विज्ञानघन थयो कहेवामां आवे छे. ज्यां सुधी मिथ्यात्व होय त्यां सुधी ज्ञानने-भले ज्ञाननो उघाड घणो होय तोपण-अज्ञान कहेवामां आवे छे. अगियार अंग अने नवपूर्वनुं ज्ञान होय पण मिथ्यात्व न गयुं होय तो ते अज्ञान छे, विज्ञान नथी. तिर्यंचने ज्ञाननो उघाड भले ओछो होय, पण जो तेनुं ज्ञान अंदर स्वभावमां स्थिर थयुं होय तो ते विज्ञान छे. जेम जेम ते ज्ञान एटले विज्ञान अंदर जामतुं जाय, घट्ट थतुं जाय, स्थिर थतुं जाय तेम तेम आस्रवोथी निवृत्ति थती जाय छे. अने