समयसार गाथा ७४ ] [ ९१ जेम जेम आस्रवोनी निवृत्ति थती जाय छे तेम तेम विज्ञान जामतुं जाय छे, घट्ट थतुं जाय छे, स्थिर थतुं जाय छे; अर्थात् आत्मा विज्ञानघनस्वभाव थतो जाय छे. ज्ञान ज्ञानमां ठरे, ज्ञान ज्ञानमां जामे, ज्ञान ज्ञानमां स्थिर थाय ते विज्ञान छे अने ते मोक्षमार्ग छे. आगळ जईने तेनुं फळ केवळज्ञान आवशे. परंतु स्वभावमां ठर्यो ज नथी, आस्रवथी-शुभाशुभभावथी भेदज्ञान कर्युं ज नथी तेनुं बधुं ज्ञान अज्ञान छे. परलक्षी शास्त्रज्ञाननो उघाड, पांच समिति, त्रण गुप्ति इत्यादिनुं ज्ञान भेदज्ञानना अभावमां अज्ञान छे, विज्ञान नथी. माटे शुभाशुभभावथी भिन्न निज ज्ञाता-द्रष्टा स्वरूप वस्तुनुं लक्ष करी एमां ज ठरतां आत्मानो विज्ञानघनस्वभाव प्रगट थाय छे अने त्यारे तेने कर्ताकर्मनी प्रवृत्ति मटे छे. * * * हवे आ ज अर्थना कळशरूप तथा आगळना कथननी सूचनिकारूप काव्य कहे छेः- * कळश ४८ः श्लोकार्थ उपरनुं प्रवचन * ‘इति एवं’ ए रीते पूर्वकथित विधानथी, ‘सम्प्रति’ हमणां ज (तरत ज) ‘परद्रव्यात्’ परद्रव्यथी ‘परां निवृत्तिं विरचय्य’ उत्कृष्ट (सर्व प्रकारे) निवृत्ति करीने ‘विज्ञानघनस्वभावम् परम् स्वं अभयात् आस्तिध्नुवानः’ विज्ञानघनस्वभावरूप एवा केवळ पोताना पर निर्भयपणे आरूढ थतो अर्थात् पोतानो आश्रय करतो (अथवा पोताने निःशंकपणे आस्तिकयभावथी स्थिर करतो), ‘अज्ञानोत्थितकर्तृकर्मकलनात् क्लेशात्’ अज्ञानथी उत्पन्न थयेली कर्ताकर्मनी प्रवृत्तिना अभ्यासथी थयेला कलेशथी ‘निवृत्तः’ निवृत्त थयेलो, ‘स्वयं ज्ञानीभूतः’ पोते ज्ञानस्वरूप थयो थको, ‘जगतः साक्षी’ जगतनो साक्षी (ज्ञाता-द्रष्टा), ‘पुराणः पुमान्’ पुराणपुरुष (आत्मा) ‘इतः चकास्ति’ अहींथी हवे प्रकाशमान थाय छे. आत्मा त्रिकाळ ज्ञानानंदस्वभावी छे. विज्ञानघन एटले शुं? के रागनो ए कर्ता अने राग एनुं कर्म-ए आत्मानुं स्वरूप नथी. अहाहा...! आत्मा तो शुद्ध निर्मळ चैतन्यघनस्वरूप एकरूप वस्तु छे. एटले पर्यायमां जे पुण्य-पापना-आस्रवना भाव छे तेथी भिन्न पडी भेदज्ञान द्वारा निज शुद्ध चैतन्यमय तत्त्वनो अनुभव करतां पोते विज्ञान-घनस्वभावरूप थाय छे. कह्युं ने के संप्रति एटले तरत ज परद्रव्यथी सर्व प्रकारे निवृत्ति करीने विज्ञानघनस्वभावरूप एवा पोताना पर निर्भयपणे आरूढ थईने कलेशथी-रागथी निवृत्त थाय छे. रागथी निवृत्त थाय छे एटले विज्ञानघनस्वभावरूप थाय छे. आ धर्म छे अने आ ज उपाय छे. शरीर, मन, वाणी जड छे. एनाथी तो आत्मा-शुद्ध चैतन्यमय वस्तु भिन्न छे ज. पण पुण्य-पापना भाव जे आस्रवभाव एनाथी पण विज्ञानघन भगवान भिन्न छे. तथापि आत्मा पर्यायमां दुःखी छे. तेने सुख केम थाय एनी आ वात छे. परद्रव्यथी