९२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ अने पुण्य-पापना भावथी एक्ताबुद्धि वडे जीव दुःखी छे. ते एक्ताबुद्धि दूर करी भेदज्ञान द्वारा पोताना विज्ञानघनस्वभाव पर आरूढ थतां, शुद्ध चैतन्यनो आश्रय करतां अतीन्द्रिय आनंदनो स्वाद आवे छे, कलेशनी निवृत्ति थाय छे. आ धर्म पामवानो अने सुखी थवानो उपाय छे. व्यवहार ते उपाय नथी. एनाथी भिन्न पडी अंतरमां भेदज्ञान करवुं ते उपाय छे. ज्यां सुधी हुं रागनो कर्ता अने राग मारुं कर्म एम माने अने एवी अज्ञानमय कर्ताकर्मनी प्रवृत्तिनो अभ्यास राखे त्यां सुधी तेने मिथ्यात्व छे, त्यां सुधी ते कलेश पामे छे, दुःख पामे छे. रागनो हुं कर्ता अने राग मारुं कर्तव्य ए मान्यता अज्ञान छे, मूढता छे अने एनुं फळ चोरासीना अवतारनां जन्म-मरणनां दुःख छे, कलेश छे. माटे व्यवहार करतां करतां धर्म थशे एवी अज्ञानमय मान्यताथी भिन्न पडीने वस्तु चिदानंदघन त्रिकाळ ध्रुव अंदरमां जे पडी छे ते एकनो आश्रय करीने एमां ज ठरवुं ते धर्म छे, ते जन्म-मरणना कलेश निवारवानो उपाय छे. अरे! लोकोने अनादिनो अभ्यास नथी एटले कठण पडे, पण मार्ग आ ज छे भाई! भेदज्ञान एक ज तरणोपाय छे. कह्युं ने के-पूर्वकथित विधानथी हमणां ज परद्रव्यथी उत्कृष्ट एटले सर्व प्रकारे निवृत्ति करीने विज्ञानघनस्वभाव एवा पोतामां आरूढ थतो ते ज्ञानस्वरूप थयो थको जगतनो साक्षी-ज्ञाताद्रष्टा थाय छे.
जुओ, पुण्य-पापना भाव ते भावकर्म, मोहनीयादि आठ द्रव्यकर्म अने शरीर, मन, इन्द्रिय, वाणी, इत्यादि नोकर्म-ए बधांने परद्रव्य कहे छे. अने चिदानंदघनस्वरूप भगवान पोते स्वद्रव्य छे. अहीं कहे छे सर्व प्रकारे परद्रव्यनी रुचि छोडी दईने सच्चिदानंदस्वरूप भगवान ज्ञायकदेवमां द्रष्टि प्रसरावी तेमां ज आरूढ-स्थित थई जतां विज्ञानघनस्वभाव प्रगट थाय छे. एकान्त छे, एकान्त छे एम लोकोने लागे, पण भाई! कोई पण राग परिणाम, -पछी ते दया, दान आदिना शुभ परिणाम केम न होय, दुःखरूप छे अने भाविना दुःखफळरूप छे. आ वात गाथामां (७४मां) आवी गई. भाई! तुं अनादिथी परद्रव्यमां रागमां आरूढ हतो ते हवे परद्रव्यथी-रागथी खसी जईने स्वद्रव्यमां आरूढ थई जा. निर्भय थईने, निःशंक बनीने स्वद्रव्यमां आरूढ थई जा; केमके एम थतां अज्ञानथी उत्पन्न थयेली कर्ताकर्मनी प्रवृत्तिना अभ्यासथी उत्पन्न थयेलो कलेश मटी जाय छे, नाश पामे छे. कर्ताकर्मनी प्रवृत्तिना अभ्यासथी कलेश थतो हतो ते स्वभावमां आरूढ थतां मटी जाय छे अने पोते ज्ञानस्वरूप थयो थको जगतनो साक्षी प्रगट थाय छे. आत्मामां कर्तृत्व नामनो गुण छे. एटले पोते पोताना निर्मळ वीतरागीभावरूप कर्मनो कर्ता थई रागथी निवर्ते त्यारे सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान प्रगट थाय छे. अने त्यारे ते जगतनो साक्षी पुराणपुरुष ज्ञाता-द्रष्टापणे प्रकाशमान थाय छे. रागादि भाव हो भले, पण तेनो ते मात्र जाणनारो-देखनारो साक्षी थाय छे, कर्ता नहि. पुण्य-पापना