समयसार गाथा ७४ ] [ ९३ जे कृत्रिम विकारी भाव तेना कर्ता थवुं ए तो कलेश छे, दुःख छे अने दुःखफळ छे. त्यांथी द्रष्टि फेरवी लईने त्रिकाळी शुद्ध ज्ञायकमां ज्यां द्रष्टि स्थापी अने ज्ञाताभावे परिणम्यो त्यां तरत ज आनंदनो स्वाद आवे छे अने जे राग रहे छे तेनो ते मात्र साक्षी ज रहे छे. अहो! भेदज्ञाननो महिमा!
तिर्यंच पण रागथी भिन्न पडीने आवुं सम्यग्दर्शन प्रगट करे छे अने आत्माना आनंदनो स्वाद ले छे. व्यवहारनुं वर्णन शास्त्रमां घणुं आवे छे पण ए तो ज्ञान करवा माटे वात छे; व्यवहार ते कांई निश्चयनुं साधन छे एम नथी. समयसार गाथा ११ना भावार्थमां पंडित श्री जयचंदजीए खूब स्पष्ट कह्युं छे के-“प्राणीओने भेदरूप व्यवहारनो पक्ष तो अनादि काळथी ज छे अने एनो उपदेश पण बहुधा सर्व प्राणीओ परस्पर करे छे. वळी जिनवाणीमां व्यवहारनो उपदेश शुद्धनयनो हस्तावलंब जाणी बहु कर्यो छे; पण एनुं फळ संसार ज छे.” त्रणेयनुं फळ संसार छे. आगळ कह्युं छे- “शुद्धनयनो पक्ष तो कदी आव्यो नथी अने एनो उपदेश पण विरल छे-कयांक कयांक छे. तेथी उपकारी श्री गुरुए शुद्धनयना ग्रहणनुं फळ मोक्ष जाणीने एनो उपदेश प्रधानताथी दीधो छे...”
मोक्षमार्ग प्रकाशकना सातमा अधिकारमां कह्युं छे के-“व्यवहारनय स्वद्रव्य-परद्रव्यने वा तेना भावोने वा कारण-कार्यादिने कोईना कोईमां मेळवी निरूपण करे छे माटे एवा श्रद्धानथी मिथ्यात्व छे तेथी तेनो त्याग करवो, वळी निश्चयनय तेने ज यथावत् निरूपण करे छे तथा कोईने कोईमां मेळवतो नथी तेथी एवा ज श्रद्धानथी सम्यक्त्व थाय छे माटे तेनुं श्रद्धान करवुं.”
वळी बंध अधिकारमां कळश १७३मां कह्युं छे के-“सर्व वस्तुओमां जे अध्यवसान थाय छे ते बधांय जिन भगवानोए पूर्वोक्त रीते त्यागवायोग्य कह्यां छे तेथी अमे एम मानीए छीए के ‘पर जेनो आश्रय छे एवो व्यवहार ज सघळोय छोडाव्यो छे’...” जुओ, व्यवहाररत्नत्रयनो विकल्प जे राग छे एनाथी लाभ (धर्म) थाय एम त्यां कह्युं नथी. अहा! आवी सत्य वात बहार आवी, छतां ते कोईने न बेसे अने विरोध करे तो शुं थाय? सौ सौनी लायकात स्वतंत्र छे.
अहाहा...! राग मारुं कर्तव्य अने हुं रागनो कर्ता एवा अज्ञानथी खसी जे अंतर स्वरूपमां एकाकार थयो ते ज्ञानस्वरूप थयो थको जगतनो साक्षी थाय छे. जेने सम्यग्दर्शन- ज्ञान थयुं ते विकल्पथी मांडीने आखा जगतनो साक्षी जाणन-देखनहारो थाय छे, कर्ता थतो नथी. आखा जगतनो साक्षी पुराण-पुरुष आत्मा अहींथी प्रकाशमान थाय छे.