कथमात्मा ज्ञानीभूतो लक्ष्यत इति चेत्–
ण करेइ एयमादा जो जाणदि सो हवदि णाणी।। ७५।।
हवे पूछे छे के आत्मा ज्ञानस्वरूप अर्थात् ज्ञानी थयो एम कई रीते ओळखाय? तेनुं चिह्न (लक्षण) कहो. तेना उत्तररूप गाथा कहे छेः-
ते नव करे जे, मात्र जाणे, ते ज आत्मा ज्ञानी छे. ७प.
गाथार्थः– [यः] जे [आत्मा] आत्मा [एनम्] आ [कर्मणः परिणामं च] कर्मना परिणामने [तथा एव च] तेम ज [नोकर्मणः परिणामं] नोकर्मना परिणामने [न करोति] करतो नथी परंतु [जानाति] जाणे छे [सः] ते [ज्ञानी] ज्ञानी [भवति] छे.
टीकाः– निश्चयथी मोह, राग, द्वेष, सुख, दुःख आदिरूपे अंतरंगमां उत्पन्न थतुं जे कर्मनुं परिणाम, अने स्पर्श, रस, गंध, वर्ण, शब्द, बंध, संस्थान, स्थूलता, सूक्ष्मता आदिरूपे बहार उत्पन्न थतुं जे नोकर्मनुं परिणाम, ते बधुंय पुद्गलपरिणाम छे. परमार्थे, जेम घडाने अने माटीने ज व्याप्यव्यापकभावनो (व्याप्यव्यापकपणानो) सद्भाव होवाथी कर्ताकर्मपणुं छे तेम पुद्गलपरिणामने अने पुद्गलने ज व्याप्यव्यापकभावनो सद्भाव होवाथी कर्ताकर्मपणुं छे. पुद्गलद्रव्य स्वतंत्र व्यापक होवाथी पुद्गलपरिणामनो कर्ता छे अने पुद्गलपरिणाम ते व्यापक वडे स्वयं व्यपातुं होवाथी (व्याप्यरूप थतुं होवाथी) कर्म छे. तेथी पुद्गलद्रव्य वडे कर्ता थईने कर्मपणे करवामां आवतुं जे समस्त कर्मनोकर्मरूप पुद्गलपरिणाम तेने जे आत्मा, पुद्गलपरिणामने अने आत्माने घट अने कुंभारनी जेम व्याप्यव्यापकभावना अभावने लीधे कर्ताकर्मपणानी असिद्धि होवाथी, परमार्थे करतो नथी, परंतु (मात्र) पुद्गलपरिणामना ज्ञानने (आत्माना) कर्मपणे करता एवा पोताना आत्माने जाणे छे, ते आत्मा (कर्मनोकर्मथी) अत्यंत भिन्न ज्ञानस्वरूप थयो थको ज्ञानी छे. (पुद्गलपरिणामनुं ज्ञान आत्मानुं कर्म कई रीते छे ते समजावे छेः-) परमार्थे पुद्गलपरिणामना ज्ञानने अने पुद्गलने घट अने कुंभारनी जेम व्याप्यव्यापकभावनो अभाव होवाथी कर्ताकर्मपणानी असिद्धि छे