Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा ७प ] [ ९प

(शार्दूलविक्रोडित)

व्याप्यव्यापकता तदात्मनि भवेन्नैवातदात्मन्यपि
व्याप्यव्यापकभावसम्भवमृते का कर्तृकर्मस्थितिः।
इत्युद्दामविवेकघस्मरमहोभारेण भिन्दंस्तमो
ज्ञानीभूय तदा स एष लसितः कर्तृत्वशून्यः पुमान्।। ४९।।

अने जेम घडाने अने माटीने व्याप्यव्यापकभावनो सद्भाव होवाथी कर्ताकर्मपणुं छे तेम आत्मपरिणामने अने आत्माने व्याप्यव्यापकभावनो सद्भाव होवाथी कर्ताकर्मपणुं छे. आत्मद्रव्य स्वतंत्र व्यापक होवाथी आत्मपरिणामनो एटले के पुद्गलपरिणामना ज्ञाननो कर्ता छे अने पुद्गलपरिणामनुं ज्ञान ते व्यापक वडे स्वयं व्यपातुं होवाथी (व्याप्यरूप थतुं होवाथी) कर्म छे. वळी आ रीते (ज्ञाता पुद्गलपरिणामनुं ज्ञान करे छे तेथी) एम पण नथी के पुद्गलपरिणाम ज्ञातानुं व्याप्य छे; कारण के पुद्गलने अने आत्माने ज्ञेयज्ञायकसंबंधनो व्यवहारमात्र होवा छतां पण पुद्गलपरिणाम जेनुं निमित्त छे एवुं जे ज्ञान ते ज ज्ञातानुं व्याप्य छे. (माटे ते ज्ञान ज ज्ञातानुं कर्म छे.)

हवे आ ज अर्थना समर्थननुं कळशरूप काव्य कहे छेः-

श्लोकार्थः– [व्याप्यव्यापकता तदात्मनि भवेत्] व्याप्यव्यापकपणुं तत्स्वरूपमां ज होय, [अतदात्मनि अपि न एव] अतत्स्वरूपमां न ज होय. अने [व्याप्यव्यापकभावसम्भवम् ऋते] व्याप्यव्यापकभावना संभव विना [कर्तृकर्मस्थितिः का] कर्ताकर्मनी स्थिति केवी? अर्थात् कर्ताकर्मनी स्थिति न ज होय. [इति उद्दाम–विवेक–घस्मर–महोभारेण] आवो प्रबळ विवेकरूप, अने सर्वने ग्रासीभूत करवानो जेनो स्वभाव छे एवो जे ज्ञानप्रकाश तेना भारथी [तमः भिन्दन्] अज्ञान-अंधकारने भेदतो, [सः एषः पुमान्] आ आत्मा [ज्ञानीभूय] ज्ञानस्वरूप थईने, [तदा] ते काळे [कर्तृत्वशून्यः लसितः] कर्तृत्वरहित थयेलो शोभे छे.

भावार्थः– जे सर्व अवस्थाओमां व्यापे ते तो व्यापक छे अने कोई एक अवस्थाविशेष ते, (ते व्यापकनुं) व्याप्य छे. आम होवाथी द्रव्य तो व्यापक छे अने पर्याय व्याप्य छे. द्रव्य- पर्याय अभेदरूप ज छे. जे द्रव्यनो आत्मा, स्वरूप अथवा सत्त्व ते ज पर्यायनो आत्मा, स्वरूप अथवा सत्त्व. आम होईने द्रव्य पर्यायमां व्यापे छे अने पर्याय द्रव्य वडे व्यपाई जाय छे. आवुं व्याप्यव्यापकपणुं तत्स्वरूपमां ज (अर्थात् अभिन्न सत्तावाळा पदार्थमां ज) होय; अतत्स्वरूपमां (अर्थात् जेमनी सत्ता-सत्त्व भिन्न भन्नि छे एवा पदार्थोमां) न ज होय. ज्यां व्याप्यव्यापकभाव होय त्यां ज कर्ताकर्मभाव होय; व्याप्यव्यापकभाव विना कर्ताकर्मभाव न होय. आवुं जे जाणे ते