९६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ पुद्गलने अने आत्माने कर्ताकर्मभाव नथी एम जाणे छे. आम जाणतां ते ज्ञानी थाय छे, कर्ताकर्मभावथी रहित थाय छे अने ज्ञाताद्रष्टा- जगतनो साक्षीभूत-थाय छे. ४९.
हवे पूछे छे के आत्मा ज्ञानस्वरूप अर्थात् ज्ञानी थयो एम कई रीते ओळखाय? तेनुं चिह्न शुं? लक्षण शुं? तेना उत्तररूप गाथा कहे छेः-
‘निश्चयथी मोह, राग, द्वेष, सुख, दुःख आदिरूपे अंतरंगमां उत्पन्न थतुं जे कर्मनुं परिणाम अने स्पर्श, रस, गंध, वर्ण, शब्द, बंध, संस्थान, स्थूलता, सूक्ष्मता आदिरूपे बहार उत्पन्न थतुं जे नोकर्मनुं परिणाम, ते बधुंय पुद्गलपरिणाम छे.’
जुओ! मोह, राग, द्वेष, सुख, दुःख इत्यादि अंतरंगमां उत्पन्न थतुं कर्मनुं परिणाम एम कह्युं एमां कर्मनुं परिणाम एटले जीवना विकारी भावकर्मनी वात छे. राग, द्वेष अने सुख-दुःखनी कल्पना इत्यादि कर्मना संगे-निमित्ते अंतरंगमां उत्पन्न थतुं जीवनुं भावकर्म छे, विकारी पर्याय छे. अने स्पर्श, रस, गंध, वर्ण, शब्द, बंध, संस्थान, स्थूलता, सूक्ष्मता इत्यादि बहार उत्पन्न थतुं नोकर्मनुं परिणाम छे. आ बधुंय पुद्गलपरिणाम छे एम अहीं कह्युं छे.
आ पुण्य-पापना अने हरख-शोकना जे भाव अंदर थाय ए पुद्गलपरिणाम छे. कर्म जड छे अने एना संगे थयेलो भाव पण कर्मनुं ज परिणाम छे. विकारी भाव ते पुद्गलपरिणाम छे, जीव नहि. आ शरीर, मन, वाणी, स्पर्श, रस, गंध, वर्ण इत्यादि जे नोकर्मना परिणाम छे ते बधाय पुद्गलपरिणाम छे. गजब वात छे! भगवाननी भक्तिना परिणाम, दया, दान, व्रतादिना विकल्प के पांचमहाव्रतना विकल्प जे अंतरंगमां ऊठे ते पुद्गलना परिणाम छे एम जाणीने ज्ञानी एनाथी भिन्न पडे छे, एनो साक्षी थई जाय छे.
बापु! आ तो धीरानी वातो छे. आ मंदिरो बंधावे अने मोटा वरघोडा काढे इत्यादि हो-हा करे तो धर्म थाय छे एम नथी. अहीं अंदरना शुभभावथी ज्यां निवर्तवुं छे त्यां बहारनी प्रवृत्ति एनी छे ए वात कयां रही? बहारनां कार्यो पोतपोताना कारणे पोतपोताना काळे थाय एने (बीजो) कोण करे? (अन्य द्रव्य अन्य द्रव्यनां कार्य करे ए वस्तुस्थिति ज नथी).
प्रश्नः– तो निमित्त विना शुं ए बधुं थाय छे?
उत्तरः– हा, निमित्त विना ए कार्यो पोताथी थाय छे. निमित्त तो एने अडतुं य नथी माटे निमित्त विना ज थाय छे. परनां कार्योने करे कोण? संयोगथी क्रिया जे