समयसार गाथा ७प ] [ ९७ काळे थवानी होय ते थाय एने अन्य कोण करे? अहीं तो रागनो हुं कर्ता अने राग मारुं कर्म एवी कर्ताकर्मनी मिथ्याबुद्धि छोडीने ज्ञातापणुं प्रगट करे एनी वात चाले छे.
भाई! उपादान अने निमित्त बंने साथे होय छे एटलुं बराबर छे. पण निमित्ते कार्य कर्युं ए वात बीलकुल (बराबर) नथी. समयसार गाथा ३७२नी टीकामां कह्युं छे के-‘वळी जीवने परद्रव्य रागादिक उपजावे छे एम शंका न करवी; कारण के अन्य द्रव्य वडे अन्य द्रव्यना गुणनो उत्पाद करावानी अयोग्यता छे; केमके सर्व द्रव्योनो स्वभावथी ज उत्पाद थाय छे.’ त्यां आगळ कह्युं छे के-‘माटी पोताना स्वभावने नहि उल्लंघती होवाने लीधे, कुंभार घडानो उत्पादक छे ज नहि; माटी ज कुंभारना स्वभावने नहि स्पर्शती थकी, पोताना स्वभावथी कुंभभावे उपजे छे.’
माटी घडानी कर्ता छे, कुंभारे घडो कर्यो नथी. कुंभार निमित्त भले होय, पण कार्य (घडो) निमित्तथी-कुंभारथी थतुं नथी. रोटली पोते पोताथी उत्पन्न थाय छे, ते अग्निथी, तावडीथी के स्त्रीथी उत्पन्न थती नथी. आम दरेक कार्यमां समजवुं. अहीं एम कहे छे के अंदरमां उत्पन्न थता दया, दान, भक्ति आदिना परिणाम ते कर्मना परिणाम छे. भावकर्म छे ए बधुंय पुद्गलपरिणाम छे, जीवस्वरूप नथी.
हवे कहे छे-‘परमार्थे जेम घडाने अने माटीने ज व्याप्यव्यापकभावनो सद्भाव होवाथी कर्ताकर्मपणुं छे तेम पुद्गलपरिणामने अने पुद्गलने ज व्याप्यव्यापकभावनो सद्भाव होवाथी कर्ताकर्मपणुं छे.’ जुओ, माटी व्यापक छे, घडो तेनुं व्याप्य छे. माटी कर्ता छे, घडो तेनुं कर्म छे. घडो कुंभारनुं कर्म नथी. घडो एना थवा काळे माटीथी थाय छे. ते माटीना (स्व) भावथी थाय छे, कुंभारना अभावथी थाय छे. आकरी वात, भाई! आ पुस्तकनुं पानुं फरे छे ने! ते आंगळीथी-आंगळीने लईने नहि. रोटलीना बटका थवानुं कार्य छे ए परमाणुथी थाय छे, दाढथी नहि; आ पाणी उनुं थाय छे ते पोताथी थाय छे, अग्निथी नहि; जे चोखा चढे छे ते स्वकाळे पोताथी ज चढे छे, पाणीथी के अग्निथी नहि. अहाहा...! वीतरागभाव थाय छे ते कर्म खरे छे एनाथी नहि. निमित्त हो भले, पण एने लईने (उपादानमां) कार्य नीपजे छे एम छे ज नहि. जैनदर्शन घणुं झीणुं छे. मोटा मोटा पंडितो गोथां खाई जाय एम छे. घडाने अने माटीने व्याप्यव्यापकभावनो सद्भाव होवाथी घडो ते कर्म अने माटी तेनो कर्ता छे. घडानो कर्ता कुंभार नथी. अहाहा...! दुनियाथी तद्न उलटी वात छे.
प्रश्नः– तो शुं आ मानवुं पडशे?
उत्तरः– भाई! जेम छे एम नक्की करीने मानवुं पडशे. थाय शुं? वस्तुस्थिति ज आ छे. जेम माटी अने घडाने व्याप्यव्यापकभावनो सद्भाव होवाथी कर्ताकर्मपणुं छे तेम