९८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ पुद्गलपरिणामने अने पुद्गलने ज व्याप्यव्यापकभावनो सद्भाव होवाथी कर्ताकर्मपणुं छे. आ विकारी परिणाम जे शुभाशुभ भाव छे ते पुद्गलना परिणाम छे. पुद्गल प्रसरीने विकारभाव थयो छे. पुद्गलपरिणाम एटले आ जे रागादि भाव छे ते पुद्गलथी थया छे, जीवथी नहि. ते पुद्गलना आश्रयथी थया छे.
आत्मा अने जडकर्मनो अनादिथी संबंध छे. कर्मनी पर्याय अनादिथी कर्मपणे थयेली छे, ते जीवे करी नथी; जीवना परिणाम कर्मे कर्या नथी. अनादिथी एक क्षेत्रे रह्या छतां एकबीजाने कर्ताकर्मपणुं नथी. जीव जीवनी पर्याय करे, कर्म कर्मनी पर्यायने करे. जीव कर्मनी अवस्थाने करे अने कर्मनो उदय जीवनी अवस्थाने-रागने करे एम नथी. आम प्रथम बे द्रव्यनी पर्यायनुं स्वतंत्रपणुं सिद्ध करीने पछी द्रव्यद्रष्टि कराववा रागना परिणामनो कर्ता जीव नहि एम अहीं कहे छे. पुद्गल-परिणाम एटले राग अने पुद्गलने व्याप्य-व्यापकभाव होवाथी कर्ताकर्मनो सद्भाव छे. पुद्गल कर्ता अने विकारी भाव पुद्गलनुं कर्म छे. जीव तेनो कर्ता नथी.
अहीं तो जीवनुं कार्य ज्ञाताद्रष्टापणुं छे एम सिद्ध करवुं छे. वस्तुद्रष्टि कराववी छे ने! आत्मा जे चैतन्यमय विज्ञानघनस्वभाव वस्तु छे ते एना निर्मळ चैतन्यपरिणामने करे पण विकारी परिणाम थाय ते एनुं कर्तव्य नथी. तेथी जे रागपरिणाम थाय ते पुद्गलनुं कार्य छे पुद्गल तेनो कर्ता छे एम अहीं कह्युं छे. ज्ञाताद्रष्टाना परिणमनमां जे राग थाय ते पुद्गलनुं कार्य छे, जीव तेनो जाणनहार छे, कर्ता नथी.
‘पुद्गलद्रव्य स्वतंत्र व्यापक होवाथी पुद्गलपरिणामनो कर्ता छे अने पुद्गलपरिणाम ते व्यापक वडे स्वयं व्यपातु होवाथी (व्याप्यरूप थतु होवाथी) कर्म छे.’ आ दया, दान आदि पुण्यना परिणाम व्याप्य छे अने पुद्गल स्वतंत्र व्यापक छे. पुद्गल प्रसरीने रागादि परिणाम करे छे. वस्तु तो चैतन्यस्वभावी छे. जीवमां एक वैभाविक शक्ति छे. पण तेनाथी विभाव थाय छे. एम नथी. पोते निमित्ताधीन थाय तो विभाव थाय छे. ए विभाव पुद्गलनुं कार्य छे, पुद्गल स्वतंत्र व्यापक थईने विभावने करे छे.
ज्ञानावरणीय कर्मथी ज्ञान रोकाय छे एम जे गोम्मटसारमां आवे छे ए तो निमित्तनुं ज्ञान करावनारुं कथन छे. बाकी ज्ञानमां जे ओछावत्तापणुं थाय छे ते पोताथी थाय छे. कर्मथी नहि. आम दरेक द्रव्यनी पर्यायनी स्वतंत्रता छे. अहीं त्रिकाळी शुद्ध ज्ञायकस्वभावनी द्रष्टिमां जे निर्मळ ज्ञानपरिणमन थाय ते ज्ञातानुं कार्य छे, पण जे रागादि भाव थाय ते ज्ञातानुं कार्य नथी. तेथी ते रागनो कर्ता पुद्गल छे अने राग ते पुद्गलनुं कर्म छे एम अहीं सिद्ध कर्युं छे.
परमार्थे घडाने अने माटीने व्याप्यव्यापकभावनो सद्भाव होवाथी कर्ताकर्मपणुं छे. माटी व्यापक ते कर्ता अने घडो व्याप्य ते एनुं कर्म छे. अहीं बे कारणथी कार्य थाय