१०० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ तेथी चैतन्यस्वभावथी बाह्य गणीने बंनेनो कर्ता पुद्गल अने बंने पुद्गलनां कर्म छे एम अहीं सिद्ध कर्युं छे.
अस्तिकायनी अपेक्षाए विकारनी पर्याय पण पोताथी पोतामां पोताने कारणे थाय छे, परथी नहि. ए तो द्रव्य-गुण-पर्याय एम त्रणे थईने अस्तिकाय सिद्ध करवानी वात छे. हवे अहीं द्रव्यद्रष्टि प्रगट करीने पर्यायद्रष्टि छोडवानी वात छे. पंचास्तिकायमां द्रव्य-गुण-पर्याय त्रणे पोताथी छे एम कह्युं छे. विकारी पर्याय पण पोताथी अने निर्मळ पर्याय पण पोताथी थाय छे. परथी नहि एम पर्यायने त्यां स्वतंत्र सिद्ध करी छे. हवे अहीं ज्यां त्रिकाळी शुद्ध एक द्रव्यस्वभाव उपर द्रष्टि करवी छे त्यां विकारी परिणामनो कर्ता पुद्गल छे, जीव तेनो कर्ता नथी एम कह्युं छे अहो! जन्म- मरणने मटाडनारो वीतराग परमेश्वरनो मार्ग अद्भुत अलौकिक छे. भाई! खूब शान्तिथी एकवार तुं सांभळ.
कहे छे के-घडाने अने माटीने व्याप्यव्यापकभाव होवाथी जेम कर्ताकर्मपणुं छे तेम विकारी परिणामने अने पुद्गलने व्याप्यव्यापकभाव होवाथी कर्ताकर्मपणुं छे. अहाहा...! शरीरादि अवस्था अने अंदर थता पुण्य-पापना भावनी अवस्था ते बधांने अहीं पुद्गलनां कार्य कह्या छे. केमके निज चैतन्यस्वभावने ज्यां रागथी भिन्न जाण्यो-अनुभव्यो त्यां निर्मळ परिणाम जे थयुं ते जीवनुं व्याप्य अने जीव तेमा स्वतंत्र व्यापक छे. ते काळे विकारना जे परिणाम थाय ते तो जीवथी भिन्न छे. तेनो व्यापक पुद्गल छे अने ते विकारी परिणाम पुद्गलनुं व्याप्य कर्म छे. वस्तु आत्मा विकारमां व्यापे एवो एनो स्वभाव (शक्ति) ज कयां छे? आ वात सांभळवा मळी न होय एटले बिचारा ककळाट करे के एकान्त छे, एकान्त छे, पण भाई! आ सम्यक् एकान्त छे. आ गाथा ७प, ७६, ७७ बहु ऊंची छे.
अरे प्रभु! आ तो तारो अंतरनो मार्ग छे. समजाय छे कांई? पुद्गलद्रव्य स्वतंत्र व्यापक होवाथी पुद्गलपरिणामनो कर्ता छे, अने पुद्गलपरिणाम ते व्यापक वडे स्वयं व्यपातुं होवाथी कर्म छे. जे शुभाशुभ विकारना परिणाम छे एनो पुद्गल स्वतंत्र व्यापक होवाथी कर्ता छे. स्वतंत्रपणे करे ते कर्ता अने कर्तानुं इष्ट ते कर्म. आ शरीर, मन, वाणी आदि अवस्था तथा पुण्यपापना भावनी अवस्था छे तेनो कर्ता पुद्गल छे, आत्मा नहि. शरीर आदिनी अवस्था थाय तेमां राग पण व्यापक नथी. जे रागादि भाव थाय तेमां जड पुद्गल स्वतंत्र कर्ता थईने परनी अपेक्षा विना पुद्गलपरिणामने करे छे.
भाई! अनंत जन्म-मरणनां दुःखनो अंत लाववानी आ वात छे. सुंदर रूपाळुं शरीर होय, पांच-पचास लाखनी संपत्ति होय एटले राजी-राजी थाय. पण भाई! एमां धूळे य राजी थवा जेवुं नथी. दुनियाने बहारनी मीठाश छे एटले के शरीर, इन्द्रियो अने विषयोमां सुखबुद्धि छे, आत्मबुद्धि छे; पण एने मिथ्यात्व छे. ए मिथ्यात्वमां अज्ञानी तणाई गयो छे. अहीं ज्ञानीने मिथ्यात्वना परिणाम नथी, साथे ज्ञान पण