१०२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ घणी गडबड थई गई छे पुद्गलपरिणामनुं ज्ञान एटले के जे काळे जे प्रकारना रागादि परिणाम थाय ते काळे, तेनुं ज्ञान थवानी पोतानी लायकात होवाथी, ते रागादिने जाणे छे. रागादि थया छे माटे ज्ञान तेने जाणे छे एम नथी. पण जे ते काळे स्वपरने जाणवानी दशा पोताने पोताथी थई छे. ए ज्ञानना परिणाम जीवनुं पोतानुं कर्म छे अने जीव तेनो स्वतंत्रपणे कर्ता छे. अहो! अद्भुत वात अने कोई अद्भुत शैली छे! तारी समजमां तो ले के मार्ग आ ज छे, भाई!
भाई! आ तो धीरानां काम छे. जेनी नजर स्वभाव उपर गई छे, जेनी नजरमां निज चैतन्य भगवान तरवरे छे एने जे राग थाय तेनुं तेने ज्ञान थाय, ए ज्ञाननो ते कर्ता छे, रागनो नहि. पुद्गलपरिणाम एटले के जे जे प्रकारनो दया आदि जे भाव थयो ते संबंधी तेनुं ज्ञान थयुं. ते काळे ते ज्ञाननी दशानो स्वकाळ ज एवो छे के स्वने जाणतां ते दया आदि जे भाव छे तेने पण जाणतुं ज्ञान थाय छे. ते ज्ञानपरिणामनो आत्मा कर्ता छे अने ज्ञानपरिणाम आत्मानुं कर्म छे. पुद्गलपरिणामने जाणतुं ज्ञान ते पुद्गलपरिणामनुं ज्ञान नथी. जेवा प्रकारे पुद्गलपरिणाम छे ते ज प्रकारनुं आत्मानुं ज्ञान पोताथी थाय छे तेने अहीं पुद्गलपरिणामनुं ज्ञान कह्युं छे.
भाई! आ तो एकांत छे, निश्चय छे एम कहीने आ अलौकिक मार्गनी उपेक्षा करवा जेवी नथी हो. व्यवहार करतां करतां पण मोक्ष थाय अने निश्चय करतां करतां पण मोक्ष थाय एम जे रीते वस्तुनुं स्वरूप नथी ते रीते निरूपण करीश तो दुनिया भले राजी थशे, पण भाई! तेमां तारो आत्मा राजी नहि थाय, तारो आत्मा नहि रीझे. तने पोताने तो मोटुं (मिथ्यात्वनुं) नुकशान ज थशे. (अने दुनिया तो नुकशानमां पहेलेथी छे ज). तुं व्यवहारने परंपरा कारण माने छे पण व्यवहार तो कारण ज नथी. जेने अहीं पुद्गलपरिणाम कह्यो छे ते व्यवहार परंपरा मोक्षनुं कारण केम होय? न ज होय. ज्ञानीने रागथी भिन्न आत्मानुं स्वसंवेदनज्ञान थयुं छे. तेने शुभभावमां अशुभ टळ्यो छे. ते आगळ वधीने स्वभावनो उग्र आश्रय लईने रागने टाळशे. आ अपेक्षाए ज्ञानीना शुभभावने व्यवहारथी परंपरा कारण कह्युं छे. निमित्त देखीने एम कह्युं छे, पण स्वभावनो उग्र आश्रय करी तेनो पण अभाव करशे त्यारे मोक्ष थशे.
पोतानुं कार्य पोताथी थाय. राग पर छे. ते रागनुं ज्ञान थाय छे ते ज्ञान आत्मानुं कार्य छे, आत्मा ते ज्ञाननो कर्ता छे. रागनुं ज्ञान थाय छे तथापि ज्ञानमां रागनो अभाव छे. बहु सूक्ष्म वात, भाई. आवो कर्ता-कर्म अधिकार दिगंबर सिवाय बीजे कयांय नथी. रागनो कर्ता जे पोताने माने छे ते अज्ञानी विकारीभावनी चक्कीमां पडयो छे. ते दुःखथी पीलाय छे, अतिशय पीडाय छे. वस्तुस्थिति ज आवी छे. अहीं कहे छे-कुंभार अने घटनी जेम आत्मा अने पुद्गलपरिणामने (रागादिने) कर्ताकर्मपणानो अभाव छे. तेथी स्वभावना अवलंबने परिणमेलो छे जे जीव ते पुद्गलपरिणामना