समयसार गाथा ७प ] [ १०३ (रागादिना) ज्ञानने आत्माना कर्मपणे करता एवा पोताना आत्माने जाणे छे अने ते कर्मनोकर्मथी अत्यंत भिन्न ज्ञानस्वरूप थयो थको ज्ञानी छे. अहाहा...! ज्ञाताद्रष्टाना भावने कार्यपणे करतो ते पोताना आत्माने जाणे छे, रागने जाणे छे एम न कह्युं. राग संबंधीनुं ते काळे पोतामां पोताना सामर्थ्यथी थयेलुं जे ज्ञान ते ज्ञानने ते (साक्षीपणे) जाणे छे. आवी वात छे. पोताना सामर्थ्यथी थयेलुं जे ज्ञान ते ज्ञान पोताना स्वरूपमां तन्मय रही साक्षी भावे रहे छे. बधानो जाणनार मात्र साक्षी भाव रहे छे.
वीतराग सर्वज्ञ परमेश्वरना मारगडा बहु जुदा छे, बापु! भगवान आत्मामां अनंत शक्तिओ छे. ते सर्व शक्तिओ अत्यंत निर्मळ छे. ४७ शक्तिओनुं ज्यां निरूपण छे त्यां क्रमरूप, अक्रमरूप प्रवर्तता अनंत धर्मोनी वात करी छे. त्यां अनंत शक्तिओ निर्मळपणे उछळे छे एम कह्युं छे. त्यां विकारनी वात ज करी नथी, केमके विकार परिणति ते जीवनी शक्तिनी पर्याय ज नथी. ४७ शक्तिना वर्णनमां द्रव्य शुद्ध, शक्ति शुद्ध अने एनी द्रष्टि थतां जे परिणमन थयुं ते पण शुद्ध ज होय एम वात लीधी छे. अशुद्धतानी त्यां वात ज लीधी नथी.
आ प्रमाणे अनंत शक्तिओनो पिंड प्रभु चिन्मात्र निज आत्माने जाणे छे ते रागादिथी अत्यंत भिन्न ज्ञानस्वरूप थयो थको ज्ञानी छे. तेने ज्ञानी अने धर्मी कहे छे. हवे पुद्गलपरिणामनुं ज्ञान आत्मानुं कर्म कई रीते छे ते समजावे छेः- जे कांई रागादि भाव-पुण्यना भाव थाय छे तेनुं ज्ञान आत्मामां थाय ते ज्ञान आत्मानुं कर्म कई रीते छे ते विशेष स्पष्ट करे छे. ज्ञान एनुं पोतानुं कार्य छे. रागनुं ज्ञान थयुं माटे राग एनुं कार्य छे एम नथी. तेम रागनुं ज्ञान थयुं ते ज्ञान रागनुं कार्य छे एम पण नथी. राग छे एम जाण्युं त्यां जाणवानी जे ज्ञाननी पर्याय थई ते रागनुं कार्य नथी; तेम जाणवानी पर्यायमां राग जणाय छे माटे राग ते ज्ञाननुं कार्य छे एम नथी. भाई! आ समजवुं पडशे हो. आ शरीरादि बधुं विंखाई जशे. आ जीवनमां जो निर्णय न कर्यो तो शुं कर्युं? पछी कयां एने जवुं? भाई! सौ प्रथम करवानुं आ ज छे.
बहारना पदार्थनी मीठाश लक्षमांथी छोडी दे शुभरागनी मीठाश पण छोडी दे. त्यारे अंदरथी आनंदनी मीठाश आवशे. रागने लक्षमांथी छोडी ज्ञानमात्र निज वस्तुने अधिकपणे लक्षमां ले. परथी भिन्न ते चैतन्य भगवान अधिक छे. ते अधिक अधिकपणे न भासे अने बीजी चीज अधिकपणे भासे ते संसार छे, चार गतिनी रझळपट्टी छे, दुःख छे.
‘परमार्थे पुद्गलपरिणामना ज्ञानने अने पुद्गलने घट अने कुंभारनी जेम व्याप्यव्यापकभावनो अभाव होवाथी कर्ताकर्मपणानी असिद्धि छे अने जेम घडाने अने माटीने व्याप्यव्यापकभावनो सद्भाव होवाथी कर्ताकर्मपणुं छे तेम आत्मपरिणामने अने आत्माने व्याप्यव्यापकभावनो सद्भाव होवाथी कर्ताकर्मपणुं छे.’