१०४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
परमार्थे पुद्गलपरिणामना ज्ञानने अने पुद्गलने घट-कुंभारनी जेम व्याप्यव्यापकभावनो अभाव छे. आत्माने रागनुं ज्ञान पोतामां रहीने स्वपरप्रकाशकपणे थयुं एवुं जे पुद्गलपरिणामनुं ज्ञान अने पुद्गल कहेतां राग-ए बेने व्याप्यव्यापकपणुं नथी. राग व्यापक अने रागनुं ज्ञान ते व्याप्य एम नथी. तेथी राग अने ज्ञानने कर्ताकर्मपणानी असिद्धि छे. पुद्गलपरिणाम जे राग ते कर्ता अने ज्ञानपरिणाम तेनुं कर्म एम नथी.
वळी आत्मपरिणामने अने आत्माने घडा अने माटीनी जेम व्याप्यव्यापकभावनो सद्भाव होवाथी कर्ताकर्मपणुं छे. अहाहा...! पोताने जाणतां राग संबंधी जे ज्ञान थयुं ते ज्ञान व्याप्य छे अने आत्मा व्यापक छे. ज्ञान ते आत्मानुं कर्म छे अने आत्मा तेनो कर्ता छे. आत्माना परिणाम एटले ज्ञाताद्रष्टाना वीतरागी निर्मळ परिणाम अने आत्मा ए बेने व्याप्यव्यापकपणुं छे तेथी त्यां कर्ताकर्मपणुं सिद्ध थाय छे. आत्मा कर्ता अने दया, दान आदि विकल्पनुं जे ज्ञान थयुं ते ज्ञान आत्मानुं कर्म छे. परंतु राग कर्ता अने ज्ञान एनुं (रागनुं) कर्म-एम नथी. अहो! गाथा खूब गंभीर छे! आत्मा (ज्ञान) कर्ता अने राग एनुं कार्य एम नथी अने राग कर्ता अने (रागनुं) ज्ञान एनुं कार्य एमेय नथी.
भाई! आ गाथा महान छे! आत्माना परिणाम अने आत्माने कर्ताकर्मपणुं छे. लक्षमां लेवा आ धीमे धीमे कहेवाय छे. ‘आत्मद्रव्य स्वतंत्र व्यापक होवाथी आत्म-परिणामनो एटले के पुद्गलपरिणामना ज्ञाननो कर्ता छे अने पुद्गलपरिणामनुं ज्ञान ते व्यापक वडे स्वयं व्यपातुं होवाथी (व्याप्यरूप थतुं होवाथी) कर्म छे.’ जुओ! आत्मद्रव्य स्वतंत्र व्यापक छे. जे जातनो राग छे ते जातनुं ज्ञान थयुं त्यां आत्मा स्वतंत्र व्यापक छे. राग छे माटे रागनुं ज्ञान थयुं एम नथी. आत्मा स्वतंत्र व्यापक होवाथी पुद्गलपरिणामना ज्ञाननो कर्ता छे. अहींयां ज्ञानना परिणाममां जे राग जणायो ते ज्ञानना परिणाममां आत्मा स्वतंत्र व्यापक छे. अहा! द्रव्य स्वतंत्र व्यापक थईने रागनुं ज्ञान करे छे. आत्मा व्यापक अने ज्ञान एनुं कर्म स्वतंत्र छे.
प्रश्नः– आत्मद्रव्य स्वतंत्र व्यापक छे एटले शुं? रागनुं ज्ञान छे एटलीय अपेक्षा छे के नहि?
उत्तरः– आत्मद्रव्य स्वतंत्र व्यापक छे एटले ते काळे जे रागने जाणवाना ज्ञानना परिणाम थया ते ज्ञानपरिणाम एनुं व्याप्य कर्म छे अने आत्मा स्वतंत्रपणे तेनो कर्ता छे. रागनुं के व्यवहारनुं ज्ञान थयुं माटे ज्ञान थवामां एटली परतंत्रता के राग के व्यवहारनी अपेक्षा छे एम छे ज नहि. ए तो आत्मा स्वतंत्रपणे कर्ता थईने ज्ञानरूपे स्वयं परिणमे छे. ज्ञाननो स्वपरप्रकाशक स्वभाव छे. ए स्वभावना कारणे ते स्वने अने परने जाणतो परिणमे छे. राग छे माटे परप्रकाशक ज्ञान थयुं एम छे ज नहि. समयसारनी वात बहु सूक्ष्म छे, पण शास्त्रमां जे छे ए वात कहेवाय छे. लोको बिचारा