Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा ७प ] [ १०प स्थूळबुद्धिने लीधे अंतरनुं काम केम करवुं एनी खबर न होय एटले आ तो निश्चयनो मार्ग, निश्चयनो मार्ग!-एम पोकारे. पण निश्चय एटले सत्य, निश्चय एटले यथार्थ, अनुपचार वास्तविक. भाई! दुनिया माने न माने तेनी साथे सत्यने संबंध नथी. सत्यने संख्या साथे शुं संबंध छे?

भगवान आत्मा स्वपरप्रकाशक ज्ञानशक्तिनो पिंड छे. ते पोते कर्ता थईने स्वपरने प्रकाशे छे. परने प्रकाशवामां एने परनी अपेक्षा नथी. राग परिणाम, व्यवहारना परिणाम थया माटे एनुं ज्ञान थयुं एटली अपेक्षा ज्ञानना परिणामने नथी. अहाहा...! आत्मा स्वतंत्रपणे कर्ता थईने ज्ञानपरिणामरूप कार्यने करे छे. बहु सूक्ष्म वात, भाई! व्यवहार छे माटे निश्चय छे एम नहि तथा व्यवहार छे माटे एने लईने एनुं ज्ञान थाय छे एम पण नहि.

लोकोए बीजी रीते मान्युं छे. व्यवहारना आश्रय वडे, निमित्तना आश्रय वडे कल्याण थशे एम लोकोए मान्युं छे. पण ते यथार्थ नथी. व्यवहारनुं अने निमित्तनुं पोते स्वतंत्रपणे कर्ता थईने ज्ञान करे छे अने ते ज्ञान एनुं कर्म छे. भाई! स्वतंत्रपणे करे तेने कर्ता कहीए. शुं लोकालोक छे माटे लोकालोकनुं ज्ञान थाय छे? भाई! एम नथी. लोकालोकने जाणवानुं ज्ञान स्वतंत्र पोताथी थाय छे. लोकालोक छे माटे तेने जाणवानुं कार्य ज्ञानमां थाय छे एम छे ज नहि. भगवान आत्मा सहज ज्ञानस्वभाव छे. माटे ज्ञाताना परिणामनुं कार्य पोताथी थाय छे. पुद्गलपरिणामनुं ज्ञान व्यापक आत्मा वडे स्वयं व्याप्यरूप थतुं होवाथी आत्मानुं स्वतंत्र कर्म छे. आवी वात छे.

आ परनी दया पाळवी ए तो आत्मानुं कार्य नहि अने परनी दया पाळवानो व्यवहारनो जे राग थाय ते पण आत्मानुं कार्य नहि. खरेखर तो व्यवहारनो जे राग छे ते ज काळे ज्ञाननी पर्याय पोताने जाणती पोताथी परिणमे छे. राग हो, देहनी स्थिति हो; पण ए बधुं परमां जाय छे. जे काळे जे प्रकारनो राग थयो, जे प्रकारे देहनी स्थिति थई ते काळे ते ज प्रकारे जाणवानी ज्ञाननी पर्याय स्वतंत्र पोताथी थाय छे. अहो! आचार्य अमृतचंद्रदेवे गजब टीका करी छे!

बारमी गाथामां कह्युं छे ने के व्यवहारनय ते काळे जाणेलो प्रयोजनवान छे. अहाहा...! जेने अखंड चैतन्यस्वरूप भगवान आत्मानुं भान थयुं छे, त्रिकाळी ध्रुवनो आश्रय थयो छे तेने पर्यायमां कंईक अपूर्णता छे, अशुद्धता छे. आ अपूर्णता अने अशुद्धता ते काळे जाणेलां प्रयोजनवान छे. ते काळे जे व्यवहारनो राग छे ते जाणेलो प्रयोजनवान छे. अहीं पण स्पष्ट कहे छे के व्यवहारनो जे राग छे तेने ते काळे पोते पोताथी स्वतंत्रपणे जाणे छे. रागनुं, व्यवहारनुं अने देहनुं जे ज्ञान थयुं ते ज्ञान