Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१०६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ आत्मानुं कर्म छे. अहाहा...! वस्तु ज्ञानस्वभावी छे ते जाणवा सिवाय बीजुं शुं करे? जे स्वभावथी ज प्रज्ञाब्रह्म, चैतन्यब्रह्म छे ते आत्मा शुं पुद्गलपरिणामनुं कार्य करे? न ज करे.

आ गाथा जैनदर्शननो मर्म छे. कहे छे के पुद्गलपरिणामनुं ज्ञान ते व्यापक आत्मा वडे, कर्ता वडे स्वयं व्यपातुं होवाथी आत्मानुं कर्म छे, कार्य छे. अहाहा...! भगवान आत्मा चैतन्यप्रकाशनी मूर्ति, चैतन्यना नूरनुं पूर प्रभु छे. ते जेणे द्रष्टिमां लीधो तेने स्वपरप्रकाशक ज्ञान प्रगट थयुं. ते ज्ञानमां राग, व्यवहार, कर्मनोकर्म इत्यादिनुं यथा अवसरे ज्ञान थयुं ते पोताथी थयुं छे. ते ज्ञाननो आत्मा कर्ता छे अने ते ज्ञान स्वयं आत्मा वडे व्यपातुं होवाथी ते आत्मानुं कार्य छे. अरे! लोको तो दया पाळवी, भगवाननी भक्ति करवी, शास्त्रस्वाध्याय करवुं इत्यादिने धर्म कहे छे पण ए तो सघळी बहारनी वातो छे. ज्ञानी तो ए सर्वने (साक्षीपणे) मात्र जाणे छे. अने ते व्यवहारने जाणनारुं जे ज्ञान ते ज्ञातानुं पोतानुं कर्म छे. लोकोने एकलो निश्चय, निश्चय एम लागे पण निश्चय ज भवसागरमांथी नीकळवानो पंथ छे.

आत्मा ज्ञानस्वभावी वस्तु त्रिकाळ सत्य छे. ए त्रिकाळी सत्ना आश्रये जे स्वपरप्रकाशक ज्ञान प्रगट थयुं ते परने पण स्वतंत्रपणे प्रकाशे छे. स्वने जाणतो ते ते काळे रागनी दशाने पोताना ज्ञानमां स्वतंत्रपणे जाणे छे. टीकामां छे के पुद्गलपरिणामना ज्ञानने करतो ते पोताना आत्माने जाणे छे. रागने जाणे छे, देहादिने जाणे छे एमेय नहि, ते काळे आत्माने जाणे छे एम लीधुं छे. स्वपरप्रकाशकपणे परिणम्यो तेणे आत्माने जाण्यो छे एम वात छे. सत्य तो आ छे, भाई. वादविवाद करवाथी कांई सत्य बीजी रीते नहि थाय.

हवे कहे छे-‘वळी आ रीते (ज्ञाता पुद्गलपरिणामनुं ज्ञान करे छे तेथी) एम पण नथी के पुद्गलपरिणाम ज्ञातानुं व्याप्य छे; कारण के पुद्गलने अने आत्माने ज्ञेयज्ञायकसंबंधनो व्यवहारमात्र होवा छतां पण पुद्गलपरिणाम जेनुं निमित्त छे एवुं जे ज्ञान ते ज ज्ञातानुं व्याप्य छे. (माटे ते ज्ञान ज ज्ञातानुं कर्म छे).’

जुओ! आत्मा पुद्गलपरिणामनुं ज्ञान करे छे तेथी पुद्गलपरिणाम एटले के दया, दान, व्रत आदिना परिणाम आत्मानुं व्याप्य कर्म छे एम नथी. पहेलां तो रागने पुद्गलपरिणाम कह्या अने हवे अहीं रागने पुद्गल कह्यो. दया, दान इत्यादि भाव पुद्गल छे एम कह्युं. पुद्गल अने आत्मा भिन्न द्रव्यो छे. आत्मा अने दया, दान आदि परिणाम भिन्न छे एम अहीं कह्युं छे. परनी दया पाळे, जात्रा करे, भक्ति करे तो धर्म थाय ए वात अहीं रहेती नथी. भगवान आत्मा निर्मळानंदनो नाथ चैतन्यघन प्रभु छे तेमां आरूढ थाय ते ज साची दया, साची जात्रा अने साची भक्ति