Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा ७९ ] [ १४प आम ऊंचुं थयुं, आ भाषा बोलाई-ए बधुं कांई जीवनुं कार्य नथी. आ चश्माथी जीव देखे- जाणे छे-एम नथी. जीव पोताना ज्ञानथी जाणे छे, चश्माथी नहि. पोते पोतानी पर्यायथी जीव जाणे छे.

अनादिनो ऊंधो अभ्यास छे एटले लोकोने आ समजवुं कठण पडे छे. एक भाई कहे के आ विषय उपर चर्चा करो. अरे भाई! चर्चा कोनी साथे करवी? आ तो पोताना हित माटे समजवानी वात छे. तेणे कह्युं के आ चश्माथी जणाय छे के नहि? शुं चश्मा विना जणाय छे? त्यारे कह्युं के बापु! चर्चा आवी गई. (थई गई). भाई! आ मारगडा तद्न जुदा छे. अहाहा...! उपादान अने निमित्त बन्ने स्वतंत्र छे. ज्ञान पोते ज्ञानथी जाणे छे, चश्माथी नहि, अने इन्द्रियोथी पण नहि.

अन्यमतवाळा इन्द्रियोने प्रमाणमां गणे छे. इन्द्रियो अने पदार्थ बन्ने मळीने तेओ प्रमाण कहे छे. पण एम छे नहि. जेमां ज्ञान नथी ते प्रमाण केवुं? इन्द्रियादि प्रमाण छे ज नहि. आत्मानुं ज्ञान स्व-परने जाणे छे ते प्रमाणज्ञान छे. अरे! लोकोने कयां खबर छे! स्वयंसिद्ध स्वतंत्र वस्तु पोते-तेने पराधीन मानी बेठा. अरे! ए तो महा विपरीत द्रष्टि छे. तेओ कहे छे-शुं चश्मा विना जणाय? आंखो बंध करो तो जणाय? इत्यादि. अरे भाई! आंखो बंध थाय के खुल्ली थाय-ए क्रिया तो जडनी छे. एने शुं आत्मा करी शके छे? बीलकुल नहि.

अहीं कहे छे-माटी पोते घडामां अंतर्व्यापक थईने, आदि-मध्य-अंतमां व्यापीने घडाने ग्रहे छे. एटले के घडानी पर्याय ते काळे माटीनुं प्राप्य छे. माटीनी पिंड अवस्था पलटीने घडारूपे परिणमे छे ते माटीनुं विकार्य छे अने माटी घडारूपे ऊपजे छे ते माटीनुं निर्वर्त्य छे. अहा! माटीनुं घडारूपे थवुं, परिणमवुं अने निपजवुं ते एकली माटीनुं कार्य छे. आ द्रष्टांत आपीने हवे सिद्धांत समजावे छे.

‘तेम जीवना परिणामने, पोताना परिणामने अने पोताना परिणामना फळने नहि जाणतुं एवुं पुद्गलद्रव्य पोते परद्रव्यना परिणाममां अंतर्व्यापक थईने, आदि-मध्य-अंतमां व्यापीने, तेने ग्रहतुं नथी, ते-रूपे परिणमतुं नथी अने ते-रूपे ऊपजतुं नथी.’

जुओ, जीवना सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रना वीतरागी परिणाम ते अहीं परद्रव्यना परिणाम छे अने राग-द्वेष तथा हरख-शोकना परिणाम ते पुद्गलद्रव्यना पोताना परिणाम छे. ते बधाने पुद्गलद्रव्य जाणतुं नथी, केमके ते जड छे. नहि जाणतुं एवुं ए पुद्गलद्रव्य, जीवना जे ज्ञाता-द्रष्टाना शुद्धरत्नत्रयना परिणाम तेमां अंतर्व्यापक थईने, आदि-मध्य-अंतमां व्यापीने तेने ग्रहतुं नथी, पहोंचतुं नथी. जीवना सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रना परिणाम पुद्गलनी अपेक्षाए अहीं परद्रव्यना परिणाम छे. ते परिणाममां (शुद्ध रत्नत्रयमां) अंतर्व्यापक थईने पुद्गल तेने ग्रहतुं नथी. अहाहा...! पुद्गल-