Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१४६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ द्रव्यना जे रागना परिणाम, हरख-शोकना परिणाम-ते जीवना शुद्ध ज्ञाता-द्रष्टाना परिणामने ग्रहता नथी, पहोंचता नथी, ते-रूपे परिणमता नथी. गजब वात छे! जीवना परिणाम (ज्ञाता-द्रष्टाना भाव) जे जीवनुं प्राप्य छे तेने पुद्गल प्राप्त करतुं नथी. पोताना परिणाम जे रागादि भाव अने हरख-शोकना परिणाम तेने पुद्गल प्राप्त करे छे; जाणतुं नथी छतां पुद्गल पोताना परिणामने प्राप्त करे छे, परंतु परद्रव्यना-जीवना परिणामने प्राप्त करतुं नथी. जो ते (पुद्गल) जाणे तो ते चेतनद्रव्य थई जाय. पण एम नथी. पांच अजीव द्रव्यो जाणतां नथी छतां ते काळे तेना जे परिणाम थाय ते तेनुं प्राप्य कर्म छे. जडनी-पुद्गलनी जे अवस्था थाय ते तेनुं-पुद्गलनुं प्राप्य कर्म छे. जे अवस्था थवाना काळे थई तेने परमाणुए प्राप्त करी छे, परमाणु तेने पहोंची वळ्‌युं छे, आत्मानुं ज्ञान त्यां पहोंची वळ्‌युं नथी. तेम पुद्गलद्रव्य एटले रागादि विकारना परिणाम (शुभभाव) पोते अंतर्व्यापक थईने जीवना शुद्ध वीतरागी परिणामने पहोंचता नथी, ते-रूपे परिणमता के ऊपजता नथी. बापु! आवो वीतरागनो पंथ एक ज हितरूप अने आराध्य छे. श्रीमदे कह्युं छे ने- ‘सर्वज्ञनो

धर्म सुशर्ण जाणी, आराध्य आराध्य प्रभाव आणी,
अनाथ एकांत सनाथ थाशे, एना विना कोई न बाह्य स्हाशे.’

आवो भगवाननो मार्ग छे. तेनुं शरण ले. ते विना बीजुं कांई शरण नथी. भाई! पुद्गलना रागपरिणाम, पुद्गलकर्मनुं फळ एवा हरखशोकना परिणाम-एने पुद्गल जाणतुं नथी. एवुं पुद्गलद्रव्य परद्रव्यना एटले आत्माना जे ज्ञाता-द्रष्टास्वरूप परिणाम तेमां अंतर्व्यापक थईने तेने ग्रहतुं नथी, ते-रूपे परिणमतुं नथी, ते-रूपे ऊपजतुं नथी. ‘परंतु प्राप्य, विकार्य अने निर्वर्त्य एवुं जे व्याप्यलक्षणवाळुं पोताना स्वभावरूप कर्म, तेनामां (ते पुद्गल द्रव्य) पोते अंतर्व्यापक थईने, आदि-मध्य-अंतमां व्यापीने, तेने ज ग्रहे छे, ते-रूपे ज परिणमे छे अने ते-रूपे ज ऊपजे छे.’ कर्तानुं जे कार्य-रागादि अने हरखशोकना परिणाम तेमां पुद्गल अंतर्व्यापक थईने, आदि-मध्य-अंतमां व्यापीने तेने ग्रहे छे, ते-रूपे परिणमे छे अने ते-रूपे ऊपजे छे, परंतु आत्माना निर्मळ वीतरागी परिणामने ते ग्रहतुं नथी, पहोंचतुं नथी. हवे कहे छे-‘माटे जीवना परिणामने, पोताना परिणामने अने पोताना परिणामना फळने नहि जाणतुं एवुं पुद्गलद्रव्य प्राप्य, विकार्य अने निर्वर्त्य एवुं जे व्याप्यलक्षणवाळुं परद्रव्यपरिणामस्वरूप कर्म, तेने नहि करतुं होवाथी, ते पुद्गलद्रव्यने जीव साथे कर्ताकर्मभाव नथी.’

जुओ, आ निष्कर्ष काढयो के परद्रव्यपरिणामस्वरूप कर्म एटले जीवना ज्ञाता-द्रष्टाना जे शुद्ध

वीतरागी परिणाम तेने पुद्गलद्रव्य करतुं नथी माटे पुद्गलद्रव्यने जीवनी साथे