समयसार गाथा ७९ ] [ १४७ कर्ताकर्मभाव नथी, एटले के राग अने हरखशोकना परिणाम ते ज्ञाताना वीतरागी परिणामना कर्ता अने ज्ञाताना जे वीतरागी परिणाम थया ते एनुं कर्म एम छे नहि. अहाहा...! व्यवहाररत्नत्रयना परिणाम निश्चयथी ज्ञाताना वीतरागी परिणामना कर्ता नथी. व्यवहाररत्नत्रयना परिणाम ते पुद्गलना परिणाम छे. ते पुद्गलना परिणाम पोताने जाणे नहि, पोताना परिणामना फळने जाणे नहि अने ज्ञाता-द्रष्टाना वीतरागी परिणामने य जाणे नहि. ए बधाने नहि जाणता एवा व्यवहाररत्नत्रयना परिणामना काळमां जीवना ज्ञाता-द्रष्टाना वीतरागी परिणाम थया माटे ते व्यवहाररत्नत्रयना-रागना परिणाम कर्ता अने ज्ञाता-द्रष्टाना परिणाम कर्म एम छे नहि. अहो! अद्भुत वात छे! प्रश्नः– ‘हेतु नियतको होई’ एम कह्युं छे ने? उत्तरः– भाई! व्यवहाररत्नत्रयने ज्यां कारण कह्युं होय त्यां निमित्तनुं ज्ञान कराववा सहचर देखीने आरोपथी उपचार करीने कथन कर्युं छे एम समजवुं. निश्चय सम्यग्दर्शन पोताना (स्वभावना) आश्रये प्रगट थयुं ते काळे जे देव-गुरु-शास्त्रनी श्रद्धानो राग छे ते समकित नथी. ते समकितनी पर्याय नथी छतां निश्चय समकितनो सहचर देखीने तेने व्यवहारथी समकित कह्युं छे. छे तो बंधनुं ज कारण तोपण उपचारथी समकित कहीने हेतु कह्यो छे. निश्चय-व्यवहारनुं सर्वत्र आवुं ज स्वरूप छे. एनुं मोक्षमार्गप्रकाशकमां खूब स्पष्टीकरण कर्युं छे. जुओ, भेदाभेदरत्नत्रयना आराधक जीवोने गृहस्थ आहार-पाणी आपे छे एवुं शास्त्रमां आवे छे. भावलिंगी मुनि छे ते भेदाभेदरत्नत्रयना आराधक छे एटले शुं? तेनो सेवे छे तो एक अभेदरत्नत्रयने; परंतु त्यां रागनो-व्यवहारनो भाव जे भूमिका अनुसार छे तेने आरोपथी रत्नत्रय कह्या छे. अहाहा...! महामुनिवर संत अंदर अभेद अंतर-आनंदनी रमतमां रमे छे, त्यां तेमने देव-गुरु-शास्त्रनी श्रद्धानो जरा विकल्प छे. तेने निश्चयरत्नत्रयनो सहचर देखीने, तेने ते आराधे छे एम कह्युं छे. आराधे छे तो निश्चयरत्नत्रयने, पण तेओ सहचर देखीने भेदरत्नत्रयने आराधे छे एम उपचारथी कह्युं छे. अहीं खरेखर तो आहार वखते पण मुनिने भेदाभेद रत्नत्रय छे, एकलो व्यवहार छे एम नथी-एम सिद्ध करवुं छे. आहार लेती वखते पण अभेदरत्नत्रय छे वात त्यां कहेवी छे. अहीं कहे छे के जे भेद छे, राग छे ए तो पुद्गलनुं कार्य छे. तेने आत्मा (मुनिवर) केम आराधे? धर्मीने तो अभेद चैतन्यना आश्रयनो अनुभव वेदनमां छे. ते काळे जे राग छे तेने व्यवहारथी आरोप करीने आराधे छे एम कह्युं छे. आराधे छे तो अभेदने एकने ज, पण बीजी चीजमां (निमित्तमां) आराधनानो आरोप आपीने तेने आराधे छे एम कह्युं छे. मोक्षमार्गप्रकाशकमां पंडितप्रवर श्री टोडरमलजीए, निश्चय-व्यवहारनी बहु सरस वात करी छे. त्यां स्पष्ट कह्युं छे के-‘मोक्षमार्ग तो बे