१४८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ नथी पण मोक्षमार्गनुं निरूपण बे प्रकारथी छे.’ तेम आराधकपणुं बे प्रकारे नथी, तेनुं कथन बे प्रकारे छे. एम साधकपणुं बे नथी, साधकपणानुं कथन बे प्रकारे छे. आत्मानो अनुभव ते निश्चय साधन छे अने ते काळे रागनी मंदतानो जे भाव तेने सहचर देखी उपचारथी साधन कह्युं छे; खरेखर ते साधन नथी.
अहीं कहे छे के पुद्गलद्रव्यने जीव साथे कर्ताकर्मभाव नथी. एटले के पुद्गलद्रव्यना परिणाम जे रागादि भाव, हरखशोकना भाव ते ज्ञानानंदस्वभावी प्रभु आत्माना निर्मळ वीतरागी परिणामने ग्रहता नथी, पहोंंचता नथी, ते-रूपे परिणमता नथी अने ते-रूपे ऊपजता नथी. रागभाव कर्ता अने ज्ञानानंदना परिणाम तेनुं कर्तव्य-एवो कर्ताकर्मसंबंध छे ज नहि.
व्यवहाररत्नत्रय कारण अने निश्चयरत्नत्रय कार्य-एवां कथन शास्त्रमां आवे छे. आचार्यश्री जयसेननी टीकामां पण बहु आवे छे. पण ए तो (व्यवहारनी) कथननी शैली छे. भाई! वीतरागनां वचनो पूर्वापर विरोधरहित होय छे. एक तरफ कहे के रागना परिणाम ते जीवना मोक्षमार्गना परिणामने करे नहि अने बीजी तरफ कहे के व्यवहार मोक्षमार्ग निश्चय मोक्षमार्गनुं कारण छे-आम परस्पर विरोधी कथनो जे अपेक्षाथी छे ते अपेक्षाथी यथार्थ समजवां जोईए. अपेक्षाथी यथार्थ समजतां विरोध रहेशे नहि.
‘कोई एम जाणे के पुद्गल के जे जड छे अने कोईने जाणतुं नथी तेने जीवनी साथे कर्ताकर्मपणुं हशे. परंतु एम पण नथी.’ पुद्गल तो जड छे ज. पण आत्मामां व्यवहारश्रद्धानो जे राग थाय ते पण अचेतन, जड छे. पंचमहाव्रतनो भाव के शास्त्र भणवानो विकल्प-ए बधा चेतन नथी, जड छे. राग छे ते रागने (पोताने) जाणतो नथी अने ते आत्माने य जाणतो नथी. तेथी ते जड छे. आवा अचेतन रागने जीवनी साथे कर्ताकर्मपणुं हशे एम कोई जाणे तो एम नथी. रागना परिणाम ते कर्ता अने धर्मीना जाणवाना परिणाम ते रागनुं कर्म-एवुं कोई माने तो ते एम नथी एम कहे छे. पुद्गलद्रव्य जीवने उत्पन्न करी शकतुं नथी अर्थात् रागनो भाव ते जीवनी सम्यग्दर्शन-ज्ञाननी पर्यायने उत्पन्न करी शकतो नथी.
आत्मा तो ज्ञानस्वरूप छे. माटे रागनी पर्यायनुं ज्ञान कर्ता अने राग तेनुं कर्म-एम भले न होय. पण जड पुद्गल तो जाणतुं नथी; तो एने आत्मा साथे कर्ताकर्मसंबंध छे के नहि? व्यवहाररत्नत्रयनो राग जे शुभोपयोगरूप छे ते कर्ता अने धर्मीना स्वने आश्रये थयेला जे स्वपरने जाणवाना परिणाम ते एनुं कार्य-आम कर्ताकर्मपणुं छे के नहि? तो कहे छे के-ना, एवुं कर्ताकर्मपणुं नथी. झीणी वात, भाई. समजवी कठण पडे पण शुं थाय?