Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा ७९ ] [ १४९

भगवान आत्मा ज्ञानानंदस्वभावी प्रभु छे. एनुं भान जेने थयुं एवा ज्ञानीने ज्ञान-श्रद्धा-शांतिना जे परिणाम थया ते एनुं कार्य छे अने आत्मा तेनो कर्ता छे. परंतु साथे व्यवहारनो जे राग छे ते एनुं कार्य अने ज्ञान (आत्मा) एनो कर्ता एम नथी. तथा व्यवहारना-रागना परिणाम कर्ता अने जीवनी स्वपरप्रकाशक जाणवानी जे पर्याय ते काळे थई ए तेनुं कार्य-एम पण नथी. जाणवाना परिणामनी आदि-मध्य-अंतमां प्रभु आत्मा पोते छे. आवा जे धर्मीना ज्ञाता-द्रष्टाना परिणाम तेने राग कर्ता थईने उत्पन्न करी शकतो नथी. अहाहा...! चैतन्यमूर्ति भगवान आत्मानुं जेने भान थयुं एवा धर्मी जीवना परिणमनमां जे स्वपरने जाणवा-देखवाना परिणाम थया तेनो ते पोते कर्ता छे, पण ते काळे जे व्यवहारनो राग छे ते राग एनो कर्ता छे एम नथी. बापु! आ तो अध्यात्मनी अंतरनी वात छे. ते कांई वादविवादथी पार पडे एवी चीज नथी.

हवे कहे छे-‘पुद्गलद्रव्य जीवने उत्पन्न करी शकतो नथी, परिणमावी शकतुं नथी तेम ज ग्रही शकतुं नथी तेथी तेने जीव साथे कर्ताकर्मपणुं नथी.’

उत्पन्न करी शकतुं नथी ते निर्वर्त्य, परिणमावी शकतुं नथी ते विकार्य अने ग्रही शकतुं नथी ते प्राप्य-एटले के जीवना ज्ञाता-द्रष्टाना वीतरागी परिणाम ते पुद्गलद्रव्यनुं प्राप्य, विकार्य अने निर्वर्त्य कर्म नथी. अहाहा...! भगवान आत्मा अनंत-अनंत-अनंत ज्ञान, आनंद, शांति आदि शक्तिनो सागर प्रभु छे. एनी द्रष्टि अने आश्रय थतां जे निर्मळ श्रद्धा-ज्ञान-शांतिना परिणाम थया तेने आत्मा उत्पन्न करे छे, ते आत्मानुं प्राप्य छे, पण ते, ते काळे जे रागनी मंदता छे तेनुं प्राप्य नथी. अहा! ए निर्मळ मोक्षमार्गना परिणामनी आदिमां ते वखतनी रागनी मंदता छे एम नथी, तेनी आदिमां तो चैतन्यघन प्रभु आत्मा छे. बापु! आ तो पोते समजीने अंदर (आत्मामां) समाई जवानी वात छे. अंदर ज्ञानस्वरूपी चिदानंद भगवान छे त्यां तुं जा अने तने अतीन्द्रिय आनंदनी अपूर्व अलौकिक दशा थशे एम अहीं कहे छे.

जुओ आ जिनवरनो-जिनेश्वरदेवनो मार्ग! भाई! ए तारो ज मार्ग छे. तुंज निश्चयथी जिन अने जिनवर छे. जिन अने जिनवरमां कांई फरक नथी. ‘जिन अने जिनवरमां किंचित् फेर न जाण’-एम शास्त्रमां आवे छे अहा! आवुं पोतानुं माहात्म्य अने मोटप जेने पर्यायमां बेठी तेने सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रनी उत्पत्ति थाय छे. ए निर्मळ मोक्षमार्गना परिणामनी उत्पत्तिमां रागनी किंचित् अपेक्षा नथी एम अहीं कह्युं छे. नियमसारनी बीजी गाथानी टीकामां कह्युं छे के निज परमात्मतत्त्वनां सम्यक्श्रद्धान-ज्ञान-अनुष्ठानरूप शुद्धरत्नत्रयात्मक मार्ग परम निरपेक्ष छे. अहा! जुओ तो खरा! चारेय बाजुथी एक ज वात सिद्ध थाय छे. भाई! आ सर्वज्ञ वीतरागनो मार्ग ए