Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१प० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ बहारनी पंडिताईनी चीज नथी. आ तो आत्मानो-चैतन्य भगवाननो अंतर अनुभव थईने पंडिताई प्रगटे ते मार्ग छे.

संसारनो-जन्ममरणनी परंपरानो अंत आवे एवी आ वात छे. जेमां संसार अने संसारनो भाव नथी एवी चीज प्रभु आत्माने द्रष्टिमां अने अनुभवमां लेतां निर्मळ रत्नत्रय प्रगट थयां छे एवा धर्मीनी अहीं वात लीधी छे. कहे छे के ज्ञानीने मोक्षमार्गनी पर्यायमां, तेनी आदिमां द्रव्य वस्तु आत्मा पोते छे. राग जाणतो नथी माटे राग तेनी आदि-मध्य-अंतमां प्रसरीने समकित आदिने उत्पन्न करे छे एम नथी. अहा! केटलुं चोक्खेचोक्खुं स्पष्ट कर्युं छे!

लोको कहे छे के ‘व्यवहारथी थाय, व्यवहारथी थाय’-अहीं कहे छे के-ना, एम नथी. व्यवहारथी थाय ए तो निमित्तनुं कथन छे. भाई! वीतरागनां वचन पूर्वापर विरोधरहित होय छे. पुद्गलद्रव्य जीवने उत्पन्न करी शकतुं नथी. एटले के शुभभावरूप जे राग छे ते आत्मानी मोक्षमार्गनी पर्यायने उत्पन्न करी शकतो नथी. अंधकार प्रकाशने केवी रीते उत्पन्न करी शके? राग छे ते अंधकार छे. व्यवहाररत्नत्रयनो राग अंधकार छे, भाई! निश्चय अने व्यवहारनी जात ज जुदी छे. एक चैतन्यप्रकाशमय छे, अने बीजुं अंधकारमय. गाथा ७२मांरागनेजड कह्यो छे. एनामां जाणवानी शक्ति नथी एटले एने अचेतन जड कह्यो छे. एने चिद्विकार कहो, अंधकार कहो के जड कहो-बधुं एक ज छे. अहीं तो ए सिद्ध कर्युं छे के राग छे ते पुद्गलना परिणाम छे अने ते शुद्ध चैतन्यना परिणाम उत्पन्न करी शकतो नथी.

प्रश्नः– अधःकरण, अपूर्वकरण अने अनिवृत्तिकरणना परिणाम होय छे एनाथी सम्यग्दर्शन थाय छे ने?

उत्तरः– भाई! खरेखर एम नथी. करणलब्धिना परिणाम होय छे एनो अभाव थईने सम्यग्दर्शन थाय छे. सम्यग्दर्शननी उत्पत्तिनी आदिमां शुद्ध चैतन्यमय आत्मा छे, तेनी आदिमां करणलब्धिना परिणाम नथी. गोम्मटसारमां आवे छे के पांचलब्धिथी सम्यग्दर्शन थाय छे. पण भाई! ए तो पूर्वे पांच लब्धि हती तेनुं त्यां ज्ञान कराव्युं छे. लब्धिथी सम्यग्दर्शन थाय छे एम एनो अर्थ नथी. अहाहा...! दिव्यशक्तिनो भंडार सच्चिदानंद प्रभु आत्मा-ते पोतानी परिणतिमां बीजानो (रागनो) आधार केम ले? अहीं तो स्पष्ट कहे छे के भेदरत्नत्रयनो राग अभेदरत्नत्रय उत्पन्न करी शकतो नथी. शास्त्रोमां ज्यां ज्ञानीने भेदाभेदरत्नत्रयनो आराधक कह्यो छे त्यां खरेखर ते एक निर्मळ अभेदरत्नत्रयनो ज करनारो अने सेवनारो एवो आराधक छे. ते काळे साथे जे भेदरत्नत्रयनो -रागनी मंदतानो भाव छे तेने सहचर वा निमित्त देखीने उपचारथी तेनो साधक कह्यो छे एम समजवुं. बापु! आ तो वस्तु स्थितिनी वात छे.