समयसार गाथा ७९ ] [ १प१
केटलाक कहे छे के-दान आपो, मंदिर बनावो, रथयात्रा काढो, शास्त्र छपावो, शास्त्र सस्ता भावे वेची प्रचार करो-इत्यादि; तेथी तमारुं कल्याण थशे. परंतु भाई! ए तो बधा विकल्प छे. आ श्रवणनो भाव छे ते विकल्प छे. ए विकल्पनी आदिमां पुद्गल छे, आत्मा नहि. तेनाथी आत्मानुं कल्याण थाय एम केम बने? गजब वात छे! तारी बलिहारी छे. नाथ! नाथ! तुं वीतराग स्वभावथी भरेलो प्रभु छो. तने वीतराग परिणतिनी उत्पत्ति माटे परनी-रागनी अपेक्षा केम होय? तारी खाणमां ज परिपूर्ण वीतरागता भरी छे. एनो आश्रय ले, तेथी तने समकित आदि वीतरागी पर्याय प्रगट थशे. (रागने भरोसे नहि थाय).
केटलाक कहे छे के चोथे गुणस्थाने सराग समकित होय, वीतराग समकित न होय. अरे भगवान! शुं कहे छे तुं आ? सराग समकित तो कोईचीज (समकित) ज नथी. एतो आरोपित चीज छे. समकितनी वीतरागी पर्याय जेने प्रगट छेएने ते काळे जे देव-गुरु- शास्त्रनी श्रद्धानो मंद रागछे तेने आरोप करीने सराग समकित कह्युं छे. पण वीतराग समकित विना सराग समकितनी (आरोपनी) अस्ति केवी? भाई! आ मान्यता तारी मोटी भूलछे. अंदर चिदानंदघनवस्तु वीतरागस्वरूपे विराजे छे. तेनो आश्रय लेतां चोथा गुणस्थाने समकित प्रगट थाय छे अने ते वीतरागी पर्याय छे. अहीं कहे छे के-ते काळे रागनी मंदता छे माटे समकित एनाथी थयुं एवुं कर्ताकर्मपणुं छे ज नहि. अहो! संतोए सत्नो ढंढेरो पीटयो छे! आत्मा अकषायस्वरूप भगवान छे. तेने अकषाय परिणाम थाय ते पोताना कारणे थाय छे. राग मंद होय एनाथी अकषाय परिणाम थाय एम छे ज नहि.
परमार्थे कोई पण द्रव्यने कोई अन्य द्रव्यनी साथे कर्ताकर्मभाव नथी. राग अन्य द्रव्य छे अने निर्मळ परिणति जीवनुं स्वद्रव्य छे. माटे रागनी दशा, जीवनी निर्मळ दर्शाने उत्पन्न करे एवो कर्ताकर्मसंबंध नथी. भाव तो घणा सूक्ष्म छे; पण कथन शैली सादी छे. तेथी समजाय एवी ज आ वात छे.
हवे आ ज अर्थनुं कळशरूप काव्य कहे छेः-
एकलां अमृत भर्यां छे आ कळशमां; शुं कहे छे? के ‘ज्ञानी’ ज्ञानी तो ‘इमां स्वपरपरिणतिम्’ पोतानी अने परनी परिणतिने ‘जानन् अपि’ जाणतो प्रवर्ते छे. सम्यग्द्रष्टि धर्मी जेने आत्मानुं भान थयुं छे. जेने धर्मनी वीतरागी दशा प्रगट थई छे तेने अहीं ज्ञानी रह्यो छे. ए ज्ञानी पोतानी अने परनी परिणति जाणतो प्रवर्ते छे. जुओ, परिणति शब्द वापर्यो छे पण पोताना द्रव्य, गुण, पर्याय त्रणेयने जाणतो