Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१प२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ प्रवर्ते छे तथा कर्मना (परना) द्रव्य, गुण, पर्याय त्रणेने जाणतो प्रवर्ते छे एम समजवुं. धर्मी एने कहीए जे पोतानी अने परनी परिणतिने जाणतो प्रवर्ते छे. ‘च’ अने ‘पुद्गलः अपि अजानन्’ पुद्गलद्रव्य पोतानी अने परनी परिणतिने नहि जाणतुं प्रवर्ते छे.

जुओ, जाणनार एवो भगवान आत्मा पोताना उत्पाद-व्यय-ध्रुव अर्थात् द्रव्य-गुण- पर्यायने जाणतो अने परना द्रव्य-गुण-पर्यायने जाणतो प्रवर्ते छे, पण परने करतो प्रवर्ते छे एम नथी. रागने करतो ज्ञानी प्रवर्ते छे एम नथी. तथा राग ज्ञाननी अवस्थाने (आत्माने) करतो प्रवर्ते छे एम पण नथी. अहा! आत्मा स्व अने परने जाणवानी दशामां प्रवर्ते छे अने पुद्गल जे राग ते स्व अने परने नहि जाणतुं प्रवर्ते छे.

हवे कहे छे-‘नित्यम् अत्यन्त–भेदात्’ आम तेमनामां सदा अत्यंत भेद होवाथी, ‘अन्तः’ ते बन्ने परस्परअंतरंगमां ‘व्याप्तृव्याप्यत्वम्’ व्याप्यव्यापकभावने ‘कलयितुम् असहौ’ पामवा असमर्थ छे. एटले के रागनी पर्याय ते वयापक अने ज्ञाननी पर्याय ते व्याप्य अथवा ज्ञाननी पर्याय ते व्यापक अने रागनी पर्याय ते व्याप्य एम परसपर व्याप्यव्यापकभाव असंभवित छे. भाई! आ पोताना हितनी वात अंतरमां विचार करीने नक्की करवी पडशे.

धर्मी जीव पोताना ज्ञान अने आनंदना परिणामने उत्पन्न करतो अने जाणतो, तथा रागादिने उत्पन्न नहि करतो अने जाणतो प्रवर्ते छे. स्व-परने जाणनारुं ज्ञान पोते पोताथी परिणम्युं छे ते रागने जाणतुं परिणम्युं छे तोपण ते रागना कारणे जाणवानुं थयुं छे एम नथी. रागने अने पोताने जाणतुं ज्ञान प्रवर्ते छे तेथी ते रागनुं कर्ता छे अने राग एनुं कर्म छे एम नथी. तथा रागपरिणाम (पुद्गलना परिणाम) छे ते आत्मानी निर्मळ पर्यायने (ज्ञानने) उत्पन्न करे छे एम पण नथी.

जुओ, ऊंडे ऊंडे लई जाय छे ज्यां निर्मळानंदनो नाथ चैतन्यघन प्रभु आत्मा विराजे छे. कहे छे-त्यां जा ने! तने तेथी सुख थशे. राग छे ए तो पुद्गलना परिणाम-दुःखना परिणाम छे. ते परिणाम आत्मानी ज्ञान अने आनंदनी परिणतिने केम करे? अहा! जे दुःख छे ते आनंदनी दशाने केम करे? राग जे अजाण छे ते ज्ञाननी पर्यायने केम उत्पन्न करे?

शुभोपयोग छे ते कांई धर्म नथी. ते धर्मनुं कारण पण नथी, शुभोपयोग तो अनादिथी करे छे. धर्म तो चैतन्यनी निर्मळ परिणति छे अने ते शुभोपयोगना कारणे थती नथी. ज्ञाननी स्वपरने जाणवानी पर्याय रागमां भळीने केवी रीते थाय? राग तो परद्रव्य छे अने जाणवा-देखवानी पर्याय स्वद्रव्यनी दशा छे, स्वद्रव्य छे. पुण्य-पाप अधिकारमां आवे छे के आत्मानी मोक्षमार्गनी पर्यायमां द्रव्यातंरनो सहारो नथी.