Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा ७९ ] [ १प३ रागादिभाव द्रव्यातंर छे, अन्यद्रव्य छे. तेनो सहारो नथी. भगवान आत्माने पोताना स्वभावनो ज सहारो छे. पोताना द्रव्यस्वभावथी उत्पन्न थयेला मोक्षमार्गनी पर्यायनो आत्मा कर्ता अने पर्याय ते एनुं कर्म छे. राग अने व्यवहार छे तेने ज्ञान जाणे छे पण एटला संबंधथी ज्ञान कर्ता अने राग एनुं कार्य तथा राग कर्ता अने ज्ञान रागनुं कर्म एम परस्पर कर्ताकर्मपणुं छे नहि. ज्ञेयज्ञायकसंबंध होवा छतां राग अने आत्माने परस्पर कर्ताकर्मसंबंध नथी.

रागने अने आत्मानी निर्मळ पर्यायने अत्यंत भेद छे. नियमसारनी गाथा ८२मां कह्युं छे के आवो भेद-अभ्यास थतां जीव मध्यस्थ थाय छे अने तेथी चारित्र थाय छे. रागभावथी चारित्र थाय छे एम नथी कह्युं पण रागना भेद-अभ्यासथी अंतरमां चारित्र थाय छे एम कह्युं छे. पहेलां सम्यग्दर्शनना काळमां भेद पडयो छे; पछी विशेष भेदना अभ्यासथी अंतरमां ठरे छे त्यारे चारित्र थाय छे. रागथी चारित्र थाय छे एम नथी. आ प्रमाणे रागने अने स्वपरने जाणनार प्रभु आत्माने अत्यंत भेद छे. रागने अने ज्ञाननी पर्यायने परस्पर अत्यंत भेद होवाथी तेमने व्याप्यव्यापकभावनो अभाव छे. राग छे ते पुद्गल छे अने ज्ञाननी निर्मळ दशा छे ते आत्मा छे. बन्ने भिन्न छे. तेथी तेमने व्याप्यव्यापकपणुं नथी, तेथी कर्ताकर्मपणुं पण नथी.

हवे कहे छे-‘अनयोः कर्तृकर्मभ्रममतिः’ जीव-पुद्गलने कर्ताकर्मपणं छे एवी भ्रमबुद्धि ‘अज्ञानात्’ अज्ञानने लीधे ‘तावत् भाति’ त्यांसुधी भासे छे के ‘यावत्’ ज्यांसुधी ‘विज्ञानार्चिः’ विज्ञानज्योति ‘क्रकचवत् अदयं’ क्रकचनी जेम निर्दय रीते ‘सद्यः भेदम् उत्पाद्य’ जीव-पुद्गलनो तत्काळ भेद ऊपजावीने ‘न चकास्ति’ प्रकाशित थती नथी.

रागथी भिन्न करीने ज्ञाननो अनुभव करे त्यारे तेने परनुं कर्ताकर्मपणुं छूटी जाय छे. शब्दो तो थोडा छे पण भाव घणा ऊचां अने गंभीर भरीदीधा छे. द्रष्टि पर्याय उपरथी फेरवी लई द्रव्य उपर लई जाय तेने विज्ञानज्योति प्रगट थाय छे. ज्ञान भले थोडुं होय, पण स्व-परनो भेद पाडी स्वानुभव करे ते विज्ञानज्योति छे. अहाहा...! चैतन्यमूर्ति भगवान आनंदनो नाथ भिन्न छे अने राग भिन्न छे एवो आत्म-अनुभव करे ते विज्ञानज्योति छे. आ विज्ञानज्योति करवतनी जेम निर्दय रीते एटले उग्रपणे जीव-पुद्गलनो तत्काळ भेद ऊपजावीने प्रगट थाय छे. पाणीना दळमां जेम तेलनुं टीपु भिन्न थई जाय छे तेम स्वानुभव करतां रागनी चीकाश अने आत्मानी वीतरागता बन्ने भिन्न थई जाय छे. अहो! शुं कळश अने शुं टीका! आचार्यदेवे गजब काम कर्युं छे.

दया, दान, व्रत आदिना भावथी आत्मा भिन्न छे. माटे व्रतना जे विकल्प छे