१प४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
एनाथी अहीं चारित्र प्रगट थयुं छे एम नथी. तेमने परस्पर कर्ताकर्मपणुं छे ज नहि. भगवान आत्मा पोताना निर्मळ श्रद्धान-ज्ञान-चारित्रपणे परिणमे अने ते रागने पण करे एम नथी. वळी राग रागने करे अने राग संबंधी जे ज्ञान थयुं ते ज्ञानने पण करे एम पण नथी. भाई! आ अंतरना मर्मनी वात छे; बहारनी पंडिताई आमां न चाले.
जीव-पुद्गलनो तत्काळ भेद उपजावीने-एटले रागथी ज्यां भिन्न पडयो अने भगवान आत्मानी सन्मुख थयो के तरत ज राग अने चैतन्यनी भिन्नता थई गई अने चैतन्यमूर्ति भगवान प्रकाशमां आव्यो, चैतन्यनी परिणति प्रकाशित थई गई. आवे धर्म कहेवामां आवे छे. आ भगवान सर्वज्ञदेव अरिहंत परमात्मा अने दिगंबर मुनिवरोनां वचन छे. आवी वात अन्यत्र कयांय छे ज नहि.
भाई! तुं जन्म-मरणना चोरासीना फेरा रागनी एकताबुद्धिना कारणे करी रह्यो छे. ते रागथी भिन्न पडी स्वभावसन्मुख थतां अवतार थता नथी. तिर्यंच पण स्वभावने पकडीने सम्यग्दर्शन पामे छे. नव तत्त्वनां नाम भले न आवडे पण आत्माना स्वभावने पकडी अनुभव करतां तेने अतीन्द्रिय आनंदनो स्वाद आवे छे अने ते संवर छे; तथा जेना आश्रये स्वाद आव्यो ते चैतन्यस्वभावमय जीव छे-एम तेने भाव-भासन थाय छे. आ अंतरनी चीज छे ते कांई वादविवदाथी पार पडे एम नथी. नियमसारमां स्वसमय अने परसमय साथे वादविवादे चढवानी ना पाडी छे. जेम गरीबने बे पांच करोडनी निधि मळी जाय तो ते पछी पोताना वतनमां आवी ते निधि एकलो भोगवे तेम ज्ञाननिधिनी प्राप्ति थई होय तो तेने एकलो भोगवजे पण वादविवाद न करीश. केमके जीवना कर्म घणा प्रकारना, जात पण घणी अने तेमना उघाड पण दरेकना भिन्न भिन्न प्रकारना होय छे. माटे आ वात एना ज्ञानमां न बेसे तो वादविवाद करीश मा.
‘भेदज्ञान थया पछी, जीवने अने पुद्गलने कर्ताकर्मभाव छे एवी बुद्धि रहेती नथी. शरीर, मन, वाणी, कर्म इत्यीद जडनी दशा साथे जीवने अज्ञानपणे पण कर्ताकर्मपणुं नथी. अहीं पुद्गल एटले राग समजवुं. व्यवहारनो जे राग छे एनाथी ज्ञानस्वभावी आत्मा भिन्न छे एवुं ज्यां भेदज्ञान थयुं त्यां जीव-पुद्गलने कर्ताकर्मभाव छे एवी बुद्धि रहेती नथी. अहाहा...! सच्चिदानंद प्रभु निश्चयनो आश्रय लईने रागने ज्यां जुदो पाडयो त्यां शरीर, मन, वाणी इत्यादिनुं कर्तापणुं तो कयांय रह्युं, अंदर दया, दान, व्रत, भक्ति आदिना जे शुभभाव छे तेनी साथे जीवने कर्ताकर्मपणानी बुद्धि खलास थई जाय छे.
त्यारे कोईवळी एम कहे छे के व्यवहारने आप सर्वथा हेय कहो छो ए एकांत छे, मिथ्यात्व छे. तेने कहे छे के व्यवहारना, दया, दान आदि पुण्यना परिणामनो