समयसार गाथा ७९ ] [ १पप
हुं कर्ता अने ते मारुं कर्म एवी जे बुद्धि छे ए मिथ्यात्व अने अज्ञान छे. भाई! व्यवहारना रागथी भेद करी तेने हेय गणीने एक निज ज्ञायकस्वरूप भगवानने उपादेय करी तेनो आश्रय करे त्यारे भेदज्ञान छे. अने त्यारे जीवने पुद्गल साथे कर्ताकर्मपणानो भाव दूर थाय छे. अरे भगवान! आवो ज वीतरागनो मार्ग छे.
जुओने, आजे सवारे केवो गमख्वार प्रसंग बनी गयो? पंदर वर्षना छोकराने हडकायुं कुतरुं करडवाथी हडकवा उपडयो. रबारीनो दीकरो, हजु थोडा ज वखत पहेलां लग्न थयेलां. एनुं दुःख जोनारा ऊभा ऊभा रडे, पण परद्रव्यमां जीव शुं करी शके? परद्रव्यमां तो आत्मा अज्ञानपणे पण कांई न करी शके. एने बिचाराने सांकळे बांध्यो. अररर! केवुं दुःख! जोयुं न जाय. थोडीवारमां ज एनो देह छूटी गयो. देह कयां एनो हतो ते साथे रहे. भाई! आवां मरण जीवे आत्माना भान विना अनंतवार कर्यां छे. बापु! रागने पो्रतानो मानी जे रागमां अटकयो छे एवा अज्ञानीने विना भेदज्ञान आवां अनंत दुःख आवी पडे छे. रागने हेय करी जे आत्माने अनुभवे ते भेदज्ञान छे. प्रभु! ए भेदज्ञान तने शरण छे. अन्य कांई शरण नथी. जे रागने हेय मानी तेनी रुचि छोडे नहि तेने आत्मानी रुचि कयांथी थाय? एक म्यानमां बे तलवार न रहे, भाई! दया, दान, व्रतादिनो राग हेय छे एम प्रथम हा तो पाड.
आ शरीर, मन, वाणी, कुटुंब-कबीला-ए बधुं धूळ-धाणी छे. एनी वात तो कयांय रही, पण अंदर जे शुभराग थाय छे तेथी रुचि छोडवी पडशे. प्रभु! हित करवुं होय तो आ ज मार्ग छे. नहितर मरीने कयांय चाल्यो जईशे. अहा! तारां दुःख जे तें सहन कर्यां तेने जोनारा पण रोया एवां पारवार दुःख तें अज्ञानभावे भोगव्यां छे.
आत्मा पूर्णानंदनो नाथ चैतन्यसंपदाथी पूर्ण भरेलो अंदर त्रिकाळ पडयो छे. अने राग तो क्षणिक मात्र एक समयनी दशा छे. रागथी तारी चीज अंदर भिन्न छे, भगवान! राग आस्रव अने बंध तत्त्व छे, ज्यारे तुं निराळो ज्ञायक अबंध तत्त्व छे, राग अचेतन छे, ज्यारे तुं चैतन्यमय भगवानस्वरूप छे. आवुं रागथी भिन्न आत्मानुं ज्ञान ते भेदज्ञान छे. प्रभु! तुं ज्यां छो त्यां जा, त्यां नजर कर. आ देह तो एनी स्थिति पूरी थतां छूटी जशे. देह कयां तारी चीज छे ते साथे रहे, अने राग पण कयां तारो छे ते साथे रहे! आ मारगडा जुदा छे. प्रभु! दुनिया साथे मेळ करवा जईश तो मेळ नहि खाय. अहीं पोतामां मेळ खाय एम छे.
रागथी भिन्न पडीने आत्मानो अनुभव थाय त्यारे जे राग छे तेने जाणे तेने व्यवहार कहेवाय छे. रागथी भेद पाडया विना जे रागमां रहे छे ए तो व्यवहारविमूढ छे. समयसार गाथा ४१३ मां तेने माटे त्रण शब्दो कह्या छे. जे अनादिरूढ, व्यवहारमूढ,