समयसार गाथा ८०-८१-८२ ] [ १६३
होय तेटला प्रमाणमां दर्शनमोह कर्म बंधाय छे. छतां आने लइने कर्म बंधाय छे एम नथी. हवे कहे छे-‘एम जीवना परिणामने अने पुद्गलना परिणामने अन्योन्य हेतुपणानो उल्लेख होवा छतां पण जीव अने पुद्गलने परस्पर व्याप्यव्यापकभावना अभावने लीधे जीवने पुद्गलपरिणामो साथे अने पुद्गलकर्मने जीवपरिणामो साथे कर्ता कर्मपणानी असिद्धि होइने, मात्र निमित्तनैमित्तिकभावनो निषेध नहि होवाथी, अन्योन्य निमित्तमात्र थवाथी ज बन्नेना परिणाम थाय छे. जीव-पुद्गलना परिणामनो परस्पर निमित्तपणानो उल्लेख होवा छतां व्याप्यव्यापकभावनो अभाव छे. एटले जीव विकार करे ते व्यापक अने जड कर्मनी अवस्था थाय ते व्याप्य एम नथी. ते ज प्रमाणे कर्मनो उदय ते व्यापक अने जीवना परिणाम ते एनुं व्याप्य एम पण नथी. परस्पर व्याप्यव्यापकभावनो अभाव होवाथी जीवने पुद्गल परिणाम साथे अने पुद्गलने जीवपरिणाम साथे कर्ताकर्मपणानी असिद्धि छे. कर्मनुं निमित्त छे तेणे जीवने राग कराव्यो अने जीवे राग कर्यो माटे जडकर्म बंधायुं-एम कर्ताकर्म भावनो बन्नेने अरसपरस अभाव छे. मात्र निमित्तनैमित्तिकभावनो निषेध नथी. एकबीजाने निमित्तनैमित्तिकभाव छे. अन्योन्य निमित्तमात्र थवाथी ज बन्ने ना परिणाम थाय छे. प्रथम पोतानी वस्तु स्वतंत्र छे एनी खबर विना धर्म केम थाय? धर्म करनारने प्रथम ख्याल होवो जोइए के अज्ञानभावे जेटला विकारी परिणाम थाय छे ते माराथी स्वतंत्र थाय छे; अने ते काळे जड कर्मनी परिणतिनुं कार्य पुद्गलथी त्यां स्वतंत्र थाय छे. मने राग- द्वेष थया माटे त्यां जडकर्मनुं परिणमन थाय छे एम नथी. प्रथम पर्यायमां विकारनी स्वतंत्रता माराथी छे अने कर्मनी पर्यायमां कर्मनी स्वतंत्रता छे एम लक्षमां आववुं जाइए. जीव अने पुद्गलने परस्पर व्याप्यव्यापकभावनो अभाव छे. तेथी एकबीजाना निमित्तपणानो उल्लेख एटले कथन होवा छतां परस्पर कर्ताकर्मभाव नथी. जीवना राग-द्वेष कर्ममां निमित्त हो, तेम कर्मनो उदय जीवना रागद्वेषनुं निमित्त हो; परंतु जीवे जे विकारी परिणाम कर्या ते कर्मबंधननी पर्यायनो कर्ता छे एम नथी तथा कर्मनो उदय विकारी भावनो कर्ता छे एम पण नथी. जीवे पोताना मिथ्यात्व अने रागद्वेषना परिणाम स्वतंत्रपणे कर्या त्यारे पुद्गल स्वयं स्वतंत्रपणे कर्मपर्यायपणे थया छे. ते ज प्रमाणे कर्म पोते स्वतंत्रपणे उदयरूप थया त्यारे जीव स्वतंत्रपणे मिथ्यात्व अने रागद्वेषरूपे परिणम्यो छे. आम बन्नेनुं परिणमन स्वतंत्र छे. भाइ! हजु पर्यायनी स्वतंत्रता जेने बेसती नथी तेने द्रव्य जे व्यक्त नथी तेनी स्वतंत्रतानी वात केम बेसे? पोतानी जे प्रगट पर्याय ते स्वतंत्र छे, परने लइने नथी.