Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


PDF/HTML Page 936 of 4199

 

१६४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४

अने कर्मनुं बंधन थाय ते कर्मने लइने छे, जीवने लइने नथी. आवी समयसमयनी पर्यायनी स्वतंत्रतानी वात जेने न बेसे तेने आनंदकंद प्रभु त्रिकाळी शुद्ध सूक्ष्म चैतन्यस्वभावनी स्वतंत्रता द्रष्टिमां नहि बेसे अने तेने सम्यग्दर्शन प्रगट नहि थाय. जे प्रगट दशा छे एनो कर्ता पर छे एम माने एने पर्यायना स्वतंत्र परिणमननी खबर नथी. अहीं तो अज्ञानपणामां जीव पोते विकारी परिणामनो स्वतंत्र कर्ता थइने ते परिणामने करे छे अने ए वात सिद्ध करी छे. भेदज्ञान थया पछी आत्मा रागनो कर्ता अने राग एनुं कार्य एवी कर्ताकर्मबुद्धि रहेती नथी.

श्री कुंदकुंदाचार्यदेवनी बार अनुप्रेक्षामां आवे छे के कर्मना आस्रवनुं (निमित्त) कारण एवो जे विकारीभाव तेना कारणे आत्मा संसारमां डूबे छे. शुभभावथी पण जीव संसारसागरमां डूबी जाय छे. दया, दान आदि पुण्यना भाव छे ते आस्रव छे अने ते मोक्षनुं कारण नथी. सम्यग्दर्शन विना अज्ञाननी जेटली बाह्य क्रिया छे ते सघळी संसारमां रखडवानी क्रिया छे. आस्रवभाव तो निंदनीय ज छे, अनर्थनुं कारण छे.

प्रश्नः– जिनवाणीमां व्यवहारने मोक्षनुं परंपरा कारण कह्युं छे ने?

उतरः– हा, पण कोने? जेणे रागथी भिन्न पडीने चैतन्यस्वरूप आत्मानो अनुभव कर्यो छे एना मंदरागना परिणामने परंपरा मोक्षनुं कारण कह्युं छे. जेने अनुभवमां ज्ञान अने आनंदनी दशा प्रगटी छे तेना शुभभावमां अशुभ टळ्‌यो छे अने हवे पछी शुद्ध चैतन्यस्वरूप स्वनो उग्र आश्रय लइने शुभने पण टाळी मोक्षपद पामशे तेथी तेना शुभ रागने परंपरा कारण कहेवामां आव्युं छे. खरेखर तो राग मिथ्याद्रष्टिने के सम्यग्द्रष्टिने मोक्षनुं कारण छे ज नहि.

समयसार नाटकमां पंडित बनारसीदासे कह्युं छे के छठ्ठागुणस्थाने पंचमहाव्रतनो के समिति, गुप्ति इत्यादिनो जे रागभाव थाय ते संसारपंथ छे, जगपंथ छे.

“ता कारण जगपंथ इत, उत सिवमारग जोर;
परमादी जगको धुकै, अपरमादी सिव ओर.”

सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रना धारक साचा संत मुनिराजने जे शुभराग छे ते प्रमाद छे अने ते जगपंथ छे, मोक्षपंथ नथी. अंतरमां आनंद स्वरूप भगवान आत्माना आश्रयथी जे वीतरागता प्रगटी छे ते मोक्षपंथ छे. अहाहा...! छठ्ठेगुणस्थाने मुनिराजने जे व्रतादिनो विकल्प छे ते जगपंथ छे. भाइ! वीतराग मार्ग वीतरागभावथी ऊभो थाय छे, रागथी नहि, राग तो संसार भणी झुके छे. अहा! ज्ञानीने तो राग साथे कर्ताकर्मभावनो अभिप्राय ज नथी, छतां जे राग छे ते जगपंथ छे. आ जिनवचन छे.