समयसार गाथा ८०-८१-८२ ] [ १६प
पंडित बनारसीदासजीए जिनवाणी विषे काव्य लख्युं छे. एमां कहे छे के-
आ ॐकारवाणी-जिनवाणी अमूल्य छे, चूल एटले मनोहर छे अने सांभळनारने आनंदरसनी देनारी छे. आ ॐध्वनि मुखनी शोभा छे.
जे ॐकारध्वनिमां बार अंगना विचार भर्यो छे ए भगवाननी वाणी एम कहे छे के-जीवना विकारी परिणाम पोताथी स्वतंत्र थाय छे त्यारे ते काळे पुद्गलो स्वयं जडकर्मनी पर्यायपणे परिणमे छे. विकारी परिणाम तेमां निमित्तमात्र छे, परंतु ए निमित्तने लइने कर्मबंधन थयुं छे एम नथी, कर्ताकर्मभाव नथी.
तत्त्वार्थसूत्रमां आवे छे के छ प्रकारना परिणाम जीव करे एनाथी ज्ञानावरणीय कर्म बंधाय छे. एनो अर्थ ए छे के जीवना परिणाम अने पुद्गलना परिणामने निमित्तनैमित्तिक संबंध छे. एटले के कर्मबंधननी परिणती स्वकाळे पोताथी थइ तो रागद्वेषना परिणाम त्यां निमित्त छे-बस एटली वात छे. परंतु जीवने रागद्वेष थया माटे कर्मबंधन थयुं एम नथी. भाइ! ॐकार ध्वनिमां आवेली वात छे.
कहे छे के मात्र निमित्तनैमित्तिकभावनो निषेध नहि होवाथी अन्योन्य निमित्तमात्र थवाथी ज बन्नेना परिणाम थाय छे. आत्मा कर्मरूप पुद्गलना गुणोने करतो नथी, तेवी रीते कर्म आत्माना रागद्वेषादि शुभाशुभ भावोने करतुं नथी. बन्नेना परिणाम परस्पर निमित्तमात्र थवाथी ज थाय छे, कर्ता नहि. जीवना विकारी परिणाममां कर्मनो उदय निमित्तमात्र छे, कर्ता नहि.
प्रश्नः– कर्मनो उदय आवे तो विकार करवो ज पडे ने?
उत्तरः– कर्मनो उदय आवे तो विकार करवो ज पडे ए मान्यता यथार्थ नथी. श्री जयसेनाचार्यनी टीकामां (प्रवचनसार गाथा ४पमां) आव्युं छे के कर्मनो उदय होवा छतां शुद्ध उपादानपणे आत्मा परिणमे तो कर्मनो उदय छूटी जाय छे, नवीन बंध थतो नथी. जीव स्वभाव सन्मुखता करे, स्वमां झुके तो कर्मनो उदय होवा छतां कर्मनी निर्जरा थइ जाय छे. जो कर्मना उदयथी बंध थाय तो संसारीओनो कर्मनो उदय सदाय रहेतो होवाथी सदा बंध ज रहे, मोक्ष न थाय; पण एम नथी.
हवे कहे छे-‘ते कारणे, जेम माटी वडे घडो कराय छे तेम पोताना भाव वडे पोतानो भाव करातो होवाथी, जीव पोताना भावनो कर्ता कदाचित् छे, परंतु जेम