१६६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
माटी वडे कपडुं करी शकातुं नथी तेम पोताना भाव वडे परभावनुं करावुं अशकय होवाथी पुद्गलभावोनो कर्ता तो कदी पण नथी ए निश्चय छे.’
जुओ, जेटला प्रमाणमां राग करे तेटला प्रमाणमां कर्म बंधाय छतां राग कर्मनी अवस्थानो कर्ता नथी. आ आंगळी ऊंची नीची थाय ते एनी पोतानी पर्यायथी थाय छे, एमां विकल्प निमित्त छे; पण विकल्पना (निमित्तना) कारणे ए कार्य त्यां जडमां थयुं छे एम नथी. लोको माने छे के-अमे देशसेवानां काम करीए छीए, समाजने सुधारी दइए छीए, कुटुंबने ऊंचु लावीए छीए. पण ए बधुं कोण करे, भाइ? तने खबर नथी के जीव कर्ता थइने कदाचित् पोताना विकारी परिणामने करे पण परनो कर्ता थइ शके नहि. अज्ञानी विकारी परिणाम ते मारुं कार्य एम माने पण परनो कर्ता थइ शके नहि. जेम माटी वडे घडो कराय छे तेम पोताना भाव वडे पोतानो भाव करातो होवाथी पोताना विकारी भावनो जीव कर्ता छे. अहीं विकारी भाव जीवना छे एम सिद्ध करीने पछी ज्ञानभाव सिद्ध करवो छे.
पोताना भाव वडे पोतानो भाव करातो होवाथी-एटले के विकारी भाव जीवमां पोताथी थाय छे. परने लइने ते थतो नथी. शास्त्रमां एम पण आवे छे के सम्यग्दर्शननी पर्यायनो आत्मा कर्ता नथी. ए तो त्यां पर्यायद्रष्टि छोडावी द्रव्यद्रष्टि कराववानी वात छे. ज्यारे अहीं अज्ञानीनी मुख्यताथी वात छे. माटे जीव अज्ञानपणे पोताना विकारी भावनो कर्ता छे एम कह्युं छे. अहीं विकारी भावनो अज्ञानी कर्ता छे एम सिद्ध करवानी वात छे.
परनो कर्ता आत्मा नथी. वळी रागनो कर्ता जे पोताने माने ते पण वास्तवमां जैन नथी. जे रागनो कर्ता पोताने माने ते मिथ्याद्रष्टि छे, जैन नथी. धर्मी जैन तो आनंदनो कर्ता थइने आनंदने भोगवे, अनुभवे छे. भाइ! जैन कोइ संप्रदाय नथी, ए तो वस्तुनुं स्वरूप छे. कह्युं छे ने के- ‘जिन सो ही है आत्मा, अन्य सो ही है कर्म,
वीतरागस्वरूप भगवान आत्मा छे. एनी ज्यां द्रष्टि अने अनुभव थयो तो ज्ञानी रागनो कर्ता थतो नथी, परंतु तेनो जाणनार ज्ञाता रहे छे; अने ते जैन छे.
राग समकितीने, मुनिने थाय छे खरो, पण ते काळे ते जाणेलो प्रयोजनवान छे. बारमी गाथामां ते आवे छे के ते ते काळे जे जे प्रकारना रागनी दशा छे तेने ते ते प्रकारे ज्ञान पोताथी जाणे छे. राग छे माटे जाणे छे एम नहि, पण परने पण जाणवानुं पोताना ज्ञाननुं स्वतंत्र परिणमन छे माटे जाणे छे.