समयसार गाथा ८०-८१-८२ ] [ १६७
अहीं कहे छे के-जेम माटी वडे घडो कराय छे तेम पोताना भाव वडे पोतानो भाव करातो होवाथी, जीव पोताना भावनो कर्ता कदाचित् छे. विकारी भावनो कर्ता कदाचित् जीव छे. कदाचित् एटले ज्यांसुधी रागथी भिन्न पडी सम्यग्दर्शन प्रगट न करे त्यां सुधी अज्ञानभावे अज्ञानी जीव रागनो कर्ता थाय छे. कदाचित् एटले अज्ञानदशामां जीव रागनो कर्ता छे. (सम्यग्दर्शन थया पछी ज्ञानी धर्मी जीव ज्ञान परिणामनो कर्ता थाय छे).
अरे जीव! तुं केटकेटला दुःखमां अनादिथी घेराइ गयो छे! भावपाहुडमां तो एम कह्युं छे के-प्रभु! अज्ञानना कारणे तारां एटलां मरण थयां के तारा मरणना काळे तारां दुःख जोइने तारी माताए रडीने जे आसुं सार्यां ते एकठां करीए तो दरियाना दरिया भराय. आवा तो मनुष्यपणाना अनंत भव कर्या. तेम नरकमां, स्वर्गमां, ढोरमां, तिर्यंचमां, निगोदादिमां अनंत-अनंत भव कर्या. अहा! दुःख ज दुःखमां तारो अनंतकाळ निजस्वरूपना भान विना गयो. अंदर सच्चिदानंदस्वरूप भगवान छेे; तेनी द्रष्टि करी नहि अने मिथ्यात्व अने राग-द्वेषना भाव करी करीने तें अनंत दु‘ख सह्यां. ए दुःखनी वात केम करवी! माटे हे भाइ! तुं अंतर्दष्टि कर, जिनभावना भाव.
वळी, जेम माटी वडे कपडुं करी शकातुं नथी तेम पोताना भाव वडे परभावनुं करावुं अशकय होवाथी, जीव पुद्गलभावोनो कर्ता तो कदी पण नथी ए निश्चय छे. माटी पोतानो भाव एटले घडानी पर्यायने करे छे, पण माटी वडे कपडुं करी शकातुं नथी. माटी कर्ता अने कपडुं एनुं कार्य एम बनतुं नथी. केवुं द्रष्टांत आप्युं छे! तेम जीव विकारना भावने करे पण कर्मनी पर्यायने करे ए अशकय छे. तेम जड कर्मना भाव वडे कर्मनो भाव थाय पण कर्मना भाव वडे जीवनो विकारी भाव करावो अशकय छे. सीमंधर भगवाननी पूजामां आवे छे के-
एकली अग्निने कोइ मारतुं नथी, पण लोहनो संसर्ग करे तो अग्निने घणना घा खावा पडे छे. तेम एकलो आत्मा, परनो संबंध करी राग-द्वेष न करे तो दुःखने पाप्त न थाय. पण निमित्तना संगे पोते राग द्वेष करे तो चारगतिना दुःखना घण खावा पडे, चारगतिमां रझळवुं पडे. अरे भाइ! रागद्वेषनी एकतानुं अनंत दुःख छे अने एवां अनंत दुःख तें भोगव्यां छे.
अहीं तो स्पष्ट वात छे के आत्मा पोताना भावने करतो होवाथी विकारीभावोनो कर्ता अज्ञानपणे आत्मा छे. परंतु जेम माटी वडे कपडुं करी शकातुं नथी तेम पोताना विकारीभाव वडे कर्मबंधन थतुं नथी. तेवी ज रीते जड कर्मना भाव वडे कर्मनो भाव