Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१६८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४

थाय पण कर्मना भाव वडे जीवनो विकारी भाव थतो नथी. कर्मने लइने जीवमां विकार थाय अने विकारने लइने कर्मबंधन थाय एम केेटलाक माने छे पण ए यथार्थ नथी.

पंचास्तिकाय गाथा ६२मां तो एम कह्युं छे के पर्यायमां जे विकार थाय छे ते पोताना षट्कारकथी थाय छे, तेमां परना षट्कारकनी अपेक्ष नथी. आ वात सांभळीने लोकोने खळभळाट थइ जाय छे. तेओ एम कहे छे के कर्मथी विकार न थाय तो विकार जीवनो स्वभाव थइ जाय छे. अरे भाइ! एम नथी. विकार पर्यायमां पोताथी थाय छे. परनी अपेक्षा तो नहि, पण पोताना द्रव्य-गुणनी पण अपेक्षा विना स्वतंत्रपणे एक समयनी पर्यायमां षट्कारकनुं परिणमन थइने विकार स्वयंसिद्ध थाय छे, परथी नहि. जेम माटीथी कपडुं न थाय तेम कर्मना उदयथी विकार न थाय अने विकारना कारणे कर्म बंध न थाय. जीवना पोताना विकारना परिणमनमां बीजी चीज (कर्मनो उदय) निमित्त हो भले, पण निमित्तने लइने विकार थयो छे एम नथी. अहीं पोतामां पोताथी विकार थयो त्यार बीजी चीजने (कर्मना उदयने) निमित्त कहेवामां आवे छे. विकार परथी थाय एम जे माने तेने अंदर एकलो आनंदघन प्रभु ज्ञानस्वभावनो रसकंद स्वयंज्योति भगवान पडयो छे ए केम बेसे?

अहाहा...! माटी वडे जेम कपडुं करी शकातुं नथी तेम पोताना विकारी भाव वडे परभावनुं करावुं, कर्मबंधननुं करावुं अशकय छे. गजब वात छे! स्थूळबुद्धिवाळाने समजवुं कठण पडे. व्रत, तप, भक्ति, पूजा इत्यादि रागमां जे होंश करी उत्साहथी रोकाइ रह्यो छे तेने अहीं कहे छे के भाइ! पूजाना शब्दोनी भाषानो कर्ता आत्मा नथी तने शुभभावनो विकल्प आवे छे माटे ‘स्वाहा’ इत्यादि शब्दो बोलाय छे एम नथी. भाइ! माटी वडे घडो थाय, पण माटी वडे शुं कपडुं थाय? न थाय. तेम पोताना भाव वडे पोतानो भाव थाय, पण पोताना भाव वडे शुं परनो भाव थाय? न थाय. पहेलां अस्तिथी कह्युं छे के पोताना भाव वडे पोतानो भाव कराय छे अने हवे नास्तिथी कह्युं के पोताना भाव वडे परनो भाव कदी करी शकातो नथी. भाइ! आ आंगळी हले छे एनो कर्ता आत्मा नथी. भाषा बोलती वेळा होठ हले एनो कर्ता आत्मा नथी. एक रजकणनी पण जे समये जे पर्याय थवानी योग्यता छे ते तेनाथी स्वतंत्रपणे थाय छे, एने आत्मा करे एम त्रणकाळमां छे नहि.

अज्ञानी जीव पोताना राग वडे रागने करे, पण राग वडे भाषा करे के आंगळी हलावे एम छे नहि. परमां लेवा-देवानुं कार्य थयुं ते एने राग छे माटे थयुं एम नथी. कोइने अनाज आपवानो शुभराग थयो माटे ए भावथी बीजाने अनाज आपी शकाय एम छे नहि. परना कार्यमां प्रभु आत्मा पांगळो छे, केमके ते परनुं कार्य करी शकतो नथी. शुभाशुभभाव थयो एनाथी कर्म बंधायुं अने एनाथी गति प्राप्त थइ एम व्यवहारथी कहेवाय छे, पण वस्तुस्वरूप एम नथी.