Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा ८०-८१-८२ ] [ १६९

अहीं स्पष्ट कहे छे के पोताना भाव वडे परभावनुं करावुं अशकय होवाथी पुद्गलभावोनो कर्ता तो जीव कदी नथी ए निश्चय छे. जीव अज्ञानभावे पोताना रागभावोने करे पण एनाथी परभावनुं करावुं अशकय छे. देशनी सेवा करी शके, दीनदुःखियाने आहार, पाणी, ओसड दइ शके-एवी परनी क्रिया आत्मा करी शके ए वात त्रण काळमां शकय नथी. शरीरनी क्रिया आत्मा करी शकतो नथी पछी करवुं के नहि ए प्रश्न ज कयां छे? आ पुस्तकनुं पानुं आम फरे ते क्रिया आंगळीथी थइ शके छे एम नथी. ए परमाणु पोते पोतानी क्रियावती शक्तिने लइने आम गति करे छे.

कळशटीकामां प्रश्न कर्यो छे के-आत्मामां अनंत शक्तिओ छे तो एमां कोइ एवी शक्ति छे के परनुं काम करे? त्यां समाधान कर्युं छे के-भगवान! आत्मा परनुं कांइ करे एवी एनामां शक्ति नथी. हा, आत्मामां एवी शक्ति छे के अज्ञानभावे पर्यायमां रागने करे पण जीव पुद्गलभावोनो कर्ता तो कदी पण नथी ए निश्चय छे. ज्ञानावरणीय कर्म बंधाय, दर्शनावरणीयकर्म बंधाय इत्यादि कर्मनी पर्यायनो कर्ता जीव त्रण काळमां नथी.

प्रश्नः– कर्मरूपी वेरीने हणे ते अरिहंत-आवो अरिहंतनो अर्थ शास्त्रमां कर्यो छे ने?

उत्तरः– हा, शास्त्रमां एवा कथन आवे छे के आत्मा कर्म बांधे, आत्मा कर्म हणे-छोडे; पण ए तो बधां व्यवहारनां कथन छे. अहीं तो कहे छे के आत्मा जड कर्मने हणी शकतो नथी. आत्मा रागद्वेष करे त्यां जे कर्म बंधाय ते एना कारणे अने वीतरागता प्रगट करे त्यां जे कर्म छूटे ते पण एना पोताना कारणे. दरेक वखतेे कर्मनी अवस्था जे थवा योग्य होय ते पोताथी स्वतंत्रपणे थाय छे. अहीं वीतरागभाव प्रगट कर्यो माटे कर्मनी अकर्मरूप अवस्था थइ एम नथी. आवुं ज वस्तु स्वरूप छे.

* गाथाः ८०–८१–८२ भावार्थ उपरनुं प्रवचन *

‘जीवना परिणामने अने पुद्गलना परिणामने परस्पर मात्र निमित्तनैमित्तिकपणुं छे तो पण परस्पर कर्ताकर्मभाव नथी.’ अहीं मिथ्यात्व अने रागद्वेषने जीवना परिणाम कह्या छे. अज्ञानीनी वात छे ने? भेदज्ञान नथी एवो अज्ञानी जीव स्वतंत्रपणे पोते ज रागद्वेषने करे छे. अज्ञानी जीवना शुभाशुभ विकारी परिणाम अने पुद्गलना परिणाम कहेतां कर्मनो उदय-ए बन्नेने परस्पर मात्र निमित्तनैमित्तिकपणुं छे. जीवना विकारी परिणाम नैमित्तिक पोताना उपादानथी थया त्यारे जड कर्मनो उदय निमित्तमात्र छे. आवुं बन्नेने निमित्तनैमित्तिकपणुं होवा छतां परस्पर कर्ताकर्मपणुं नथी. जीवना विकारी परिणाममां कर्मनुं निमित्त अने कर्म परिणमे छे एमां अज्ञानीना रागद्वेषनुं नुं निमित्त-आम परस्पर निमित्तनैमित्तिकपणुं होवा छतां कर्ताकर्मपणुं नथी. कर्म जीवना रागने करे अने राग छे ते कर्मबंधनी पर्यायने करे एम कदीय नथी.