१७० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
जडनी पर्याय; एनाथी जीवने विकार थाय एनी अहीं ना पाडे छे. कर्मनो उदय जडना परिणाम छे. ए जीवना विकारी परिणामने करे एनो अहीं निषेध करे छे. कहे छे के जीवना परिणाम अने पुद्गलना परिणामने परस्पर कर्ताकर्मभाव नथी. अज्ञानदशामां जीव पोताना विकारी भावोनो कर्ता छे, पण परभावोनो कर्ता कदी पण नथी.
पोताना कारणे आवे छे, सांभळे छे अने स्वतंत्र पोतानी तेवी योग्यताथी समजे छे. भाइ! आ निमित्त-उपादाननी स्वतंत्रतानी वात लोकोने समजवी कठण पडे छे; पण अहीं तो स्पष्ट कह्युं छे के-जीवना विकारी परिणाम अने कर्मबंधननी पर्यायने परस्पर निमित्तनैमित्तिक संबंध होवा छतां कर्ताकर्मभाव नथी.
हवे कहे छे-‘परना निमित्तथी जे पोताना भाव थया तेमनो कर्ता तो जीवने अज्ञानदशामां कदाचित् कही पण शकाय, परंतु जीव परभावनो कर्ता तो कदी पण नथी.’ ज्यांसुधी रागथी भगवान आत्मा भिन्न छे एवुं भेदज्ञान थयुं नथी त्यां सुधी अज्ञानदशामां निमित्तना लक्षे मिथ्यात्व अने रागद्वेषना परिणाम जीवे स्वतंत्रपणे पोते कर्या छे-माटे तेनो कर्ता कही शकाय. त्यां दर्शनमोहनो उदय आव्यो माटे मिथ्यात्व थयुं छे एम नथी. निमित्त छे खरुं, पण एनाथी जीवने विकारी परिणाम थया छे एम नथी. तथा विकारी परिणाम थया माटे कर्मबंध थयो छे एम नथी. कर्मबंधनी पर्याय पोताथी जे थवा योग्य हती ते स्वतंत्रपणे थइ छे तेमां रागद्वेषना परिणाम निमित्तमात्र छे, कर्ता नहि. रागद्वेष कर्मबंधनना कर्ता छे अने कर्मबंधन एनुं कार्य छे एम नथी.
आत्मा कर्मने लइने विकार करे छे एम जो कोइ कहेतुं होय तो ते वात तद्न खोटी छे. कर्म छे ए परद्रव्यना परिणाम छे अने विकार छे ए स्वद्रव्यना भूलना परिणाम छे. चाहे तो मिथ्यात्व करे के रागद्वेष करे, ए दोषरूप परिणाम पोताथी स्वतंत्र कर्ता थइने जीव करे छे. स्वतंत्र एटले निमित्तनी एने अपेक्षा नथी, निमित्त हो भले. पंचास्तिकाय गाथा ६२मां आव्युं छे ने के विकारनी पर्याय पोते कर्ता, विकारी पर्याय ते कर्म, विकारी पर्याय ते साधन, विकारी पर्याय ते संप्रदान, ते ज अपादान अने ते ज अधिकरण-एम विकारी परिणमनना षट्कारक पर्यायनां पोताना स्वतंत्र छे. द्रव्य-गुण पण विकारना कर्ता नथी अने परद्रव्य पण विकारनुं कारक नथी. आवी द्रव्यना परिणमननी स्वतंत्रतानी वातनो निर्णय यथार्थपणे करवो पडशे हों. एमां संदिग्धपणुं नहि चाले.