Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा ८०-८१-८२ ] [ १७१

आम वात छे त्यारे कोइ एम कहे छे के कर्मना कारण विना विकार थाय तो विकार जीवनो स्वभाव थइ जाय. भाइ! पर्यायमां जे विकार थाय छे ते वर्तमान पर्यायनो स्वभाव ज छे. पर्यायना षट्कारक पर्यायथी छे, द्रव्य-गुणथी नहि. द्रव्य-गुण तो त्रिकाळ शुद्ध छे अने आ पर्याय जे विकारी थइ छे ते पोताथी थइ छे.द्रव्य-गुण शुद्ध छे तो पर्यायमां विकार थयो कयांथी? तो कहे छे के वर्तमान पर्यायनी योग्यताथी स्वतंत्रपणे विकार थयो छे, कर्मने कारणे विकार थयो छे एम नथी. अज्ञानदशामां जीव मिथ्यात्व अने रागद्वेषनो कर्ता छे पण परभावनो कर्ता तो कदी पण नथी. कर्मने बांधे कर्मनी पर्याय अने छोडे पण कर्मनी पर्याय; जीव तेनो कर्ता नथी. जीव देहनी अवस्थाने करे एम पण कदी बनतुं नथी. शरीरने आम चलावुं एवा रागने ते अज्ञानवश करे छे तेथी ते रागनो कर्ता छे, पण देहनी अवस्थानो त्रण काळमां ते कर्ता नथी. भाइ! बहु धीरज अने शान्तिथी आ समजवुं. अनादिथी तुं जन्म-मरणना सागरमां गोथां खातो दुःखमां डूबी रह्यो छे. अरे भाइ! सुखनो सागर एवो भगवान आत्मा छे, तेना भान विना तुं दुःखी ज दुःखी छे. प्रश्नः– मिथ्यात्व अने पुण्य पापना भावने अज्ञानपणे जीव परनी अपेक्षा विना स्वतंत्रपणे करे छे एवी स्वतंत्रतानो निर्णय करावीने एने(आत्माने) कयां लइ जवो छे? उत्तरः– आवी स्वतंत्रता सिद्ध करीने एने त्रिकाळी आनंदनो नाथ ज्ञायकस्वरूप भगवान पोते छे त्यां एने लइ जवो छे. शास्त्रनुं तात्पर्य वीतरागता छे ने? पंचास्तिकायमां कह्युं छे के चारे अनुयोगनां शास्त्रोनुं तात्पर्य वीतरागता छे. अहीं पण जे वात चाले छे एनुं पण तात्पर्य वीतरागता छे. जीवमां विकार स्वतंत्र थाय छे एवो निर्णय करावीने एने विकारमां रोकी राखवो नथी, पण विकाररहित शुद्ध चैतन्यस्वभावमय भगवान आत्मा छे त्यां एने लइ जवो छे. स्व-आश्रयमां एने लइ जवो छे, केमके स्व-आश्रयथी वीतरागता छे अने ज्यां सुधी परनो आश्रय छे त्यां सुधी एने राग ज छे. अनंतकाळथी जीव पोतानी स्वच्छंदताथी संसारमां रखडे छे. व्यवहारथी-रागथी लाभ(धर्म) थाय एवी ऊंधी मान्यताथी ते संसारमां रखडे छे. पण बापु! रागथी वीतरागता न थाय. व्यवहारनुं लक्ष छोडीने स्वनुं निज चैतन्यस्वभावमय त्रिकाळी शुद्ध आत्मानुं लक्ष करे त्यारे वीतरागी पर्याय प्रगट थाय. विकार पोते स्वतंत्रपणे करे छे पण विकारथी आत्मा हाथ आवे एवी चीज नथी. ए तो शुद्ध चैतन्यनी निर्विकारी अनुभूतिथी प्राप्त थाय छे अने ते अनुभूति स्वना आश्रय वडे प्रगटे छे. खरेखर तो त्रिकाळी ज्ञायकभाव जे छे ते आत्मा छे.नियमसार गाथा ९१मां आवे छे के-‘मिथ्यारत्नत्रयने छोडीने, त्रिकाळ निरावरण, नित्य आनंद जेनुं एक लक्षण छे एवो, निरंजन निज परमपारिणामिकभावस्वरूप कारणपरमात्मा ते आत्मा छे; तेना स्वरूपनां श्रद्धान-ज्ञान-आचरणनुं रूप ते खरेखर निश्चयरत्नत्रय छे.’ आवा त्रिकाळी