Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१७२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४

शुद्ध कारणपरमात्मानी द्रष्टि करी तेमां ज स्थिरता करवी ते सम्यग्दर्शन आदि वीतरागतारूप धर्म छे. बाकी बधां थोथेथोथां छे. आवी वीतराग निर्मळ अनुभूति कराववानुं अहीं प्रयोजन छे. अहो! दिगंबर आचार्योए केवां गजब काम कर्यो छे! कइ पण पानुं (शास्त्रनुं) फेरवो के कोइ पण गाथा लो, बधे एक आत्मा ज घूंटयो छे, अमृत ज घूंटयुं छे. कहे छे-प्रभु तुं कोइ छो? अहाहा...! एक समयनी पर्याय विनानी चीज भगवान! तुं निर्मळ आत्मा छो. एने पोतानी निर्मळ अनुभूतिथी जाणवो ते धर्म छे अने आ सिवाय तेने पामवानो बीजो कोइ उपाय नथी. व्यवहाररत्नत्रयना रागथी ते जाणवामां आवतो नथी; रागरहित निर्विकल्प अनुभूतिथी आत्मा आवो छे एवी एनी प्रतीति थाय छे. आ मुदनी वात छे. (आवा आत्माने प्राप्त करवो होय तो प्रथम पर्यायनी स्वतंत्रता नक्की करवी पडशे).

कोइने हरखनो सन्निपात थयो होय तो खडखड हसे, दांत काढे. पण शुं ते सुखी छे? ना; ते दुःखी ज छे. एम विकार करीने अमे सुखी छीए एम कोइ माने तो ते पागल दुःखी ज छे. त्रिलोकीनाथ सर्वज्ञ परमात्मा कहे छे के तुं अमारी सामे जोइश तो तने राग ज थशे, केमके अमे(तारा माटे) परद्रव्य छीए. माटे तुं तारा स्वद्रव्यमां जो, तेथी तने वीतरागता अने धर्म थशे. अरिहंत परमात्मा कहे छे के अमे ज्यारे मुनिदशामां हता त्यारे अमने आहारदान आपनारने ते दानना भाव वडे पुण्यबंध थयो हतो, धर्म नहीं. (परना आश्रये थता कोइ भावथी धर्म न थाय).

कोई साधुने आहारदान आपवाथी संसार परित थाय एम माने तो ते तद्न खोटी वात छे. शुभभावथी संसार परित थाय एम कदीय बने नहि. हाथीना भवमां ससलानी दया पाळी तेथी संसार परित थयो-आवां बधा कथन सत्य नथी.

अहीं तो कहे छे के विकारी परिणामनो जीव स्वतंत्रपणेकर्ता छे, तेमां परनी- कर्मोदयनी अपेक्षा नथी. आम विकारनुं स्वतंत्रपणुं सिद्ध कर्युं छे. विकार पर्यायमां समये समये पोताना षट्कारकथी नवो नवो थाय छे. अने निर्मळानंदनो नाथ चैतन्यस्वभावी वस्तु त्रिकाळ एवी ने एवी ध्रुव पडी छे तेनो आश्रय लेतां सम्यग्दर्शन आदि धर्म प्रगट थाय छे. भगवान आत्मा स्वना आश्रये जे मोक्षमार्गनी पर्याय प्रगट करे तेनो पण ए स्वतंत्र कर्ता छे. जडकर्मनो अभाव थयो माटे मोक्षमार्ग थयो छे एम नथी. आवी वस्तुस्थित छे ते यथार्थ समजवी जोइए.

[प्रवचन नं. १३७ शेष, १३८, १३९ चालु * दिनांक २६-७-७६ थी २८-७-७६]