समयसार गाथा ८३ ] [ १७प
व्यापक अने समुद्रनुं तरंग एनुं व्याप्य-एम नथी. माटे त्यां कर्ताकर्मपणानी असिद्धि छे. समुद्रमां तरंग उठयुं ते वेळा पवननुं निमित्त छे पण पवनथी तरंग उठयुं छे एम नथी. अने तरंग शमी गयुं त्यारे पवननो अभाव निमित्त छेे, पण पवनना अभावने कारणे तरंग शमी गयुं छे एम नथी. दरियामां मोजां उठे एमां पवननुं निमित्तपणुं हो. वळी मोजां शमाय एमां पवनना अभावनुं निमित्त हो. (निमित्त नथी एम कोण कहे छे?). एम होवा छतां पवनने लइने मोजुं उत्पन्न थयुं अने पवन नथी माटे मोजुं शमाय गयुं एम नथी. संयोगद्रष्टि वडे जोनारने एम भासे के आ पवन आयो(वायो) माटे मोजां उछळ्यां अने पवन वातो बंध थयो माटे मोजां शमी गयां. परंतु भाइ! वस्तु स्वरूप एम नथी. पोताना कारणे मोजुं थयुं छे अने पोताना कारणे शमी गयुं छे. कहे छे ने के पवन अने समुद्रने व्याप्यव्यापकपणानो अभाव होवाथी कर्ताकर्मपणानी असिद्धि छे. पवन मोजाने उत्पन्न करे अने पवननो अभाव मोजाने शमावी दे एम त्रणकाळमां नथी. लोकोने एवुं लागे छे के निमित्तथी परमां कांइ न थाय तो एने निमित्त केम कहीए? अरे भाइ! निमित्त परद्रव्यने अडतुंय नथी. परद्रव्यनी पर्यायने निमित्तनी पर्याय अडती नथी. माटे निमित्तने लइने परद्रव्यमां कांइक थाय एवुं छे ज नहि. ‘समुद्र ज पोते अंतर्व्यापक थइने उत्तरंग अथवा निस्तरंग अवस्थाने विषे आदि- मध्य-अंतमां व्यापीने उत्तरंग अथवा निस्तरंग एवा पोताने करतो थको, पोताने एकने ज करतो प्रतिभासे छे परंतु अन्यने करतो प्रतिभासतो नथी.’
शुं कह्युं? समुद्र ज पोते अंतर्व्यापक थइने उत्तरंग अथवा निस्तरंग अवस्थाने विषे आदि-मध्य-अंतमां व्यापे छे. तरंग उठवानी आदिमां समुद्र छे, मध्यमां समुद्र छे अने एना अंतमां समुद्र छे. एनी आदिमां पवन छे एम नथी. तरंगमां पवन प्रसरेलो छे एम नथी. अहाहा...! तरंगनी उत्पति समुद्र करे छे अने तेनो विलय पण समुद्र पोते करे छे. तरंगना विलयनी आदिमां समुद्र छे, पवननो अभाव नथी. वळी समुद्रनी उत्तरंग वा निस्तरंग पर्यायनी उत्पत्तिमां समुद्र पोताने एकने ज करतो प्रतिभासे छे, निमित्तने करतो प्रतिभासतो नथी. शीतळ हवाने करतो होय-एम अन्यने करतो प्रतिभासतो नथी. ‘अने वळी जेम ते ज समुद्र, भाव्यभावकभावना अभावने लीधे परभावनुं पर वडे अनुभवावुं अशकय होवाथी, उत्तरंग अथवा निस्तरंगरूप पोताने अनुभवतो थको, पोताने एकने ज अनुभवतो प्रतिभासे छे परंतु अन्यने अनुभवतो प्रतिभासतो नथी.’
पर भाव्य नाम थवा योग्य अने भावक नाम थनार पोते-एम भाव्यभावकभावना अभावने लीधे परभावनुं पर वडे अनुभवावुं अशकय छे माटे समुद्र पवनने अनुभवतो