१७६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
नथी. समुद्र पोतानी उत्तरंग वा निस्तरंग अवस्थाने अनुभवतो थको पोताने एकने ज अनुभवतो प्रतिभासे छे, पण पवननी अवस्थाने अनुभवतो प्रतिभासतो नथी. आ प्रमाणे समुद्र पोताना भावने करे छे अने पोताना भावने भोगवे छे; परंतु पवननी पर्यायने करतो नथी अने भोगवतो नथी.
भाई! वीतराग मार्ग बहु सूक्ष्म छे. परमात्माए अनंत तत्त्व कह्यां छे. ते अनंत अनंतपणे कयारे सिद्ध थाय? के पोते पोतानी पर्यायथी छे अने परथी नथी एम निश्चत थाय तो. जो पोतानी पर्याय परथी होय तो अनंत अनंतपणे सिद्ध कइ रीते थाय. बधो खीचडो थइ जशे. अहीं द्रष्टांतमां पण ए ज निश्चित कर्युं के समुद्र अन्यने करतो के अनुभवतो प्रतिभासतो नथी.
हवे आत्मामां सिद्धांत लागु करे छे. कहे छे-‘तेवी रीते ससंसार अने निःसंसार अवस्थाओने पुद्गलकर्मना विपाकनो संभव अने असंभव निमित्त होवा छतां पण पुद्गलकर्मने अने जीवने व्याप्यव्यापकभावना अभावने लीधे कर्ताकर्मपणानी असिद्धि छे.’
संसारदशा एटले मिथ्यात्व, राग-द्वेष, कषाय, योग आदि सहित जीवनी दशा तथा निःसंसार अवस्था एटले शुद्ध चैतन्यस्वभावना आश्रये उत्पन्न थती जीवनी सम्यग्दर्शन- ज्ञान-चारित्ररूप मोक्षमार्गनी अवस्था. तेमां अनुक्रमे पुद्गलकर्मना विपाकनो संभव अने असंभव निमित्त होय छे.
आत्माना मिथ्यात्व अने राग-द्वेषना परिणाम ए एनी संसारदशा छे; कर्मनो विपाक एमां निमित्त छे. निमित्त छे एटले कर्मनो विपाक आत्मानी विकारी संसार दशाने करे छे एम अर्थ नथी. संसार युक्त जीव निगोदमां हो के स्वर्गमां, एने जे मिथ्यात्व अने राग- द्वेष सहित अवस्था छे तेमां कर्मनो विपाक निमित्त होवा छतां जडकर्म कर्ता अने विकारी परिणाम एनुं कार्य एम छे नहि, केमके पुद्गलकर्म अने जीवने परस्पर व्याप्यव्यापकभावनो अभाव होवाथी कर्ताकर्मपणानी असिद्धि छे. जीव स्वयं पोताना अशुद्ध उपादाननी योग्यताथी पोतानी संसारदशाने उत्पन्न करे छे. कर्मनो उदय आवे तो विकार करवो पडे अने कर्म खसे तो सम्यग्दर्शन आदि धर्म थाय एम केटलाक माने छे पण तेमनी आ मान्यता जूठी छे, विपरीत छे एम अहीं कहे छे.
प्रश्नः– घनघाती कर्मनो अभाव थाय तेथी केवळज्ञान थाय छे एम शास्त्रमां आवे छे ने?
उत्तरः– ए तो निमित्तनी मुख्यताथी कहेलुं व्यवहारनयनुं कथन छे. घनघाती कर्मनो नाश थयो माटे अर्हंतने केवळज्ञान थयुं छे एम नथी. केवळज्ञाननी पर्यायने अर्हंतना जीवे स्वतंत्रपणे कर्ता थइने करी छे. केवळज्ञान थवामां घनघाती कर्मना