१७८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
आम छे छतां कोइने आवी तत्त्वनी वात न बेसे तो तेना प्रति विरोध न होय. कोइ पण व्यक्ति हो! अंदर भगवान बिराजे छे, भाइ! एक समयनी पर्यायमां तेनी भूल छे. ए भूलने काढी नाखे तो पोते भगवान छे. ए भूल केम नीकळे एनी अहीं वात चाले छे. अहीं कहे छे के निमित्तथी कार्य थाय, व्यवहारथी(निश्चय) थाय एम छे ज नहि.
लोकोने आवी वात कदी सांभळी न होय एटले आकरी लागे छे. पण मार्ग तो आ ज छे बापु! प्रभु! तुं तारी पर्यायनो स्वतंत्र कर्ता छे. विकारी के अविकारी पर्यायने स्वतंत्रपणे करनारो तुं पोते कर्ता छे; एमां परनी-निमित्तनी रंचमात्र पण अपेक्षा नथी. मिथ्यात्वादिनी विकारी पर्याय स्वयं पोताना षट्कारकरूपे परिणमीने उत्पन्न थाय छे, निमित्तथी नहि अने पोताना द्रव्यगुणथी पण नहि. केमके द्रव्य-गुण त्रिकाळ शुद्ध छे अने मिथ्यात्वादि भाव तो अशुद्ध छे. द्रव्यमां जेम षट्कारको छे तेम पर्यायमां पण पोताना षट्कारक स्वतंत्र छे.
अत्यारे तो घणी गडबड थइ गइ छे. केटलाक कहे छे के-आ तो अभिन्न कारकनी वात छे. पण अभिन्ननो अर्थ शुं? ए ज के विकार थाय छे ते परनी अपेक्षा विना स्वतंत्र पोताथी थाय छे. परकारकथी निरपेक्षपणे विकार पोताथी स्वतंत्र थाय छे एम पंचास्तिकायनी गाथा ६२मां पाठ छे. ए वात अहीं सिद्ध करे छे. भाइ! दिगंबर संतोनी वाणी पूर्वापर विरोध रहित होय छे. पूर्वापर विरोध होय ते वीतरागनी वाणी ज नथी. भाइ! ज्यां जे अपेक्षाथी कथन होय त्यां ते अपेक्षाथी यथार्थ समजवुं जोइए. कह्युं छे ने के- ‘अपनेको आप भूलके हेरान हो गया,’ माटे कर्मने लइने विकार थाय छे एम छे ज नहि. पूजामां आवे छे के-
अग्नि लोहमां प्रवेश करे तो तेना उपर घणना घा पडे छे, भिन्न रहे तो घणना घा पडता नथी. एम भगवान आत्मा निमित्तनो संग करीने विकार करे तो दुःखना घा खावा पडे छे.
जुओ, पोतेे निमित्तनो संग करीने स्वतंत्रपणे पोतानी पर्यायमां मिथ्यात्व अने रागद्वेषना भाव करे छे. विषय वासनानी जे पर्याय थाय छे तेमां वेदनो उदय निमित्त भले हो, पण वासना जे उत्पन्न थइ ते पोतानथी थइ छे. द्रव्य वेदनो उदय कर्ता अने वासना एनुं कार्य एम नथी. पर कर्ता अने पर भोक्ता नथी पण आत्मा स्वयं पोतानी पर्यायने करे छे ए वात अहीं सिद्ध करवी छे.
द्रव्य अने पर्यायनी परस्पर वात होय त्यां तो मिथ्यात्व अने सम्यक्त्व-ए