Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


PDF/HTML Page 952 of 4199

 

१८० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४

प्रश्नः– बन्ने सामसामे बळिया छे एम कहो तो?

उत्तरः– ना, एम नथी. कोई वखते कर्मनुं जोर अने कोई वखते आत्मानुं जोर एम

नथी. हा, कोईवार विकारनुं जोर अने कोईवार अविकारनुं जोर एम होय छे, परंतु आत्मानी अवस्थामां कर्मनुं जोर बीलकुल नथी. अरे भाई! तत्त्वज्ञाननी यथार्थ समजण विना धर्म केम थाय?

हवे कहे छे- ‘जीव ज पोते अंतर्व्यापक थईने ससंसार अथवा निःसंसार अवस्थाने विषे आदि-मध्य-अंतमां व्यापीने ससंसार अथवा निःसंसार एवा पोताने करतो थको, पोताने एकने ज करतो प्रतिभासो परंतु अन्यने करतो न प्रतिभासो.’ अहो! दिगंबर संतोए थोडामां घणुं भरी दीधुं छे. मिथ्यात्वादि संसारअवस्थामां आत्मा पोते अंतर्व्यापक थईने तेनी आदि-मध्य-अंतमां व्यापे छे, प्रसरे छे. मिथ्यात्वादि विकार थयो एनी आदिमां निमित्त कर्म प्रसर्युं छे, व्याप्युं छे एम नथी. ते ज प्रमाणे निःसंसार अवस्था एटले सम्यक्त्वादि मोक्षमार्गनी अवस्था जे स्वाश्रये प्रगटी तेनी आदि- मध्य-अंतमां पण आत्मा छे. सम्यक्त्वादि प्रगट थवानी आदिमां कर्मनो अभाव छे एम नथी. कर्मनो अभाव जे निमित्त छे ते कर्ता अने सम्यक्त्वादि प्रगट थयां ते एनुं कर्म एम नथी. वळी सम्यक्त्वादि पर्याय ते कर्ता अने कर्मनो अभाव एनुं कर्म एम पण नथी. अरे प्रभु! तारी स्वतंत्रता तो जो! विकार थवानी आदि-मध्य-अंतमां तारी चीज छे अने मोक्षमार्ग थवानी आदि-मध्य-अंतमां पण तारी चीज छे. पर चीजनो-कर्मनो अभाव थयो तो सम्यक्त्वादि प्रगट थयां छे एम छे नहि.

प्रश्नः– कर्मनो उदयमां जीव भ्रष्ट थाय छे एम प्रवचनसारमां आवे छे नहि ने?

उत्तरः– हा, पण ए तो कथनपद्धति छे. जीव पोतानी योग्यताथी स्वतंत्रपणे भ्रष्ट थाय छे त्यारे कर्मनो उदय निमित्त छे बस. कर्मनो उदय आव्यो माटे भ्रष्ट थयो एम छे ज नहि.

त्यां प्रवचनसारमां ४७ नयनुं वर्णन छे त्यां एम कह्युुं छे के कर्तानये रागनो कर्ता जीव छे. राग-कर्तव्य एटले करवा लायक छे एम मानीने कर्ता थाय ए तो मिथ्याद्रष्टि छे. सम्यग्द्रष्टिने राग करवा लायक कर्तव्य छे एवी कर्ताबद्धिनो अभाव होवा छतां अस्थिरतामां रागनुं परिणमन थाय छे. तेने जे रागनुं परिणमन छे तेनो पोते कर्ता छे एम कह्युं छे. सम्यग्दर्शन थया पछी कर्मनो उदयनो भाव (विकार) आत्मानो (स्वभावनो) छे एम समकिती मानता नथी, परंतु पर्यायमां अस्थिरतानुं जे रागरूप परिणमन छे तेने तेम (ते प्रकारे) जाणे छे अने परिणमन छे ए अपेक्षाए तेने रागनो कर्ता कह्यो छे. ते राग कर्मना कारणे थयो छे एम नथी. अध्यात्म पंचसंग्रहमां लीधुं छे के छठ्ठा गुणस्थानमां चारित्रमोहकर्मनुं जोर छे.