समयसार गाथा ८३ ] [ १८१
माटे तीव्र कषाय थाय छे अने सातमामां संज्वलनो मंद उदय छे माटे मंद राग थाय छे. पण ए तो कथनशैली छे. छठ्ठ-सातमां गुणस्थानमां जे व्यक्त-अव्यक्त विकारी परिणमन छे ते पोताथी छे. निमित्तना लक्षे विकार थाय छे माटे निमित्तथी थाय छे एम कोई जग्याए कहेवामां आवे छे, पण ए थाय छे पोताथी, निमित्तथी कर्मथी नहि.
७६मी गाथामां एम कह्युं के- रागथी भिन्न पडीने जेणे भेदज्ञान प्रगट कर्युं, आत्माना आनंदनो अनुभव कर्यो ए भेदज्ञानीने आत्मा व्यापक अने निर्मळ अवस्था एनुं व्याप्य छे. अने एने जे विकार थाय छे तेनुं व्यापक कर्म (द्रव्यकर्म) छे. जुओो, आत्मामां एवी कोई शक्ति नथी के जीवने विकार थाय. माटे स्वभावनो जेने अनुभव थयो तेनुं व्याप्य तो निर्मळ अवस्था छे. मोक्षमार्गनी निर्मळ अवस्था एनुं व्याप्य कर्म छे. विकारथी भिन्न पडी विकारनो ज्ञाता थवाने लीधे, निमित्त कर्म व्याप्क अने विकारी दशा एनुं व्याप्य एम कहीने बेने (जीव अने विकारने) भिन्न करी दीधा छे. भाई! ज्यां जे अपेक्षा होय त्यां ते यथार्थ समजवी जोईए.
प्रश्नः– आत्मानुं परनुं करे एवी कोई शक्ति एनामां छे के नहि?
उत्तरः– ना, परनुं कार्य करे एवी आत्मामां कोई शक्ति नथी. कळशटीका, कळश प४मां श्री राजमलजी कहे छे के - “अहीं कोई मतांतर निरूपशे के द्रव्यनी अनंत शक्तिओ छे, तो एक शक्ति एवी पण हशे के एक द्रव्य बे द्रव्योना परिणामने करे; जेवी रीते जीवद्रव्य पोताना अशुद्धचेतनारूप रागद्वेष मोह परिणामने व्याप्यव्यापकपणे करे तेवी ज रीते ज्ञानावरणादि पिंडने व्याप्यव्यापकपणे करे उत्तर आम छे के द्रव्यने अनंत शक्तिओ तो छे परंतु एवी शक्ति तो कोई नथी के जेनाथी, जेवी रीते पोताना गुण साथे पण व्याप्यव्यापकपणे छे तेवी ज रीते परद्रव्यना गुण साथे पण व्याप्यव्यापकपणे थाय.” परनुं करे एवी कोई शक्ति आत्मामां नथी. पर्यायमां विकारी भावने करे एवी पर्यायमां शक्ति छे, द्रव्य-गुणमां नहि. निर्मळ दशाने करे एवी ज द्रव्य-गुणमां शक्ति छे.
भाई! दरेक आत्मा ईश्वर छे. एम जड पण जडेश्वर छे. परमाणु जडेश्वर छे. विभाव जीव स्वतंत्रपणे करे छे माटे तेने विभावेश्वर पण कहे छे. चैतन्य भगवान चेतन ईश्वर छे. भाई! भगवाननुं कहेलुं आ तत्त्वनुं स्वरूप समजवुं पडशे. आमां विरोध करवा जेवुं नथी. तें सांभळ्युं न होय एटले सत्य कोई असत्य थई जाय?
मिथ्यात्व अने रागद्वेषनी पर्यायनी आदि-मध्य-अंतमां आत्मा छे, अने सम्यग्दर्शन -ज्ञान-चारित्रनी निर्विकारी दशानी आदि-मध्य-अंतमां आत्मा छे. कर्मनो उदय छे माटे विकार थयो छे एम नथी अने कर्मनो उदयनो अभाव छे माटे सम्यग्दर्शन आदि थयां एम नथी. संसारनी अने मोक्षमार्गनी पर्याय आत्मा स्वयं स्वतंत्रपणे करे छे; एमां कर्मनुं कोई कार्य नथी.