१८२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
हवे कहे छे-‘अने वळी तेवी रीते आज जीव, भाव्यभावकभावना अभावने लीधे परभावनुं पर वडे अनुभवावुं अशकय होवाथी, ससंसार अथवा निःसंसाररूप पोताने अनुभवतो थको, पोताने एकने ज अनुवतो प्रतिभासो परंतु अन्यने अनुभवतो न प्रतिभासो.’
जीव संसारदशामां पोताना विकारने भोगवे छे पण परने भोगवतो नथी. आ शरीरीनी अवस्थाने के कर्मने आत्मा भोगवतो नथी. ते पोताना विकारी परिणामने भोगवे के पोताना निर्विकारी परिणमने भोगवे पण परने ते भोगवतो नथी. जीव रागद्वेषनो जेम स्वतंत्र कताृ छे तेम स्वतंत्र भोक्ता छे. जड कर्मनो उदय एमां निमित्त भले हो, पण ते परने-कर्मने भोगवे छे एम नथी. अने जे कर्मनो उदय छे ते विकारनो भोक्ता छे एम पण नथी.
प्रश्नः– आ तो एकांत थयुं!
उत्तरः– हा, एकांत छे, पण सम्यक् एकांत छे. सम्यक् एकांतनुं ज्ञान थाय तेने ज अनेकांतनुं यथार्थ ज्ञान थाय छे. निमित्तनो सद्भाव हो के अभाव हो, जीव स्वयंसिद्ध विकार करे छे अने विकारने भोगवे छे. आम सम्यक् एकांतनुं ज्ञान थयुं तो जोडे निमित्त छे एनुं ज्ञान थयुं ते एकांत छे. बीजी चीजथी त्यां विकार थाय छे एम नथी. बीजी चीज विकार भोगवे छे एम पण नथी. संसारयुक्त अने संसाररहित पोतानी दशाने एकने ज करतो अने एकने ज भोगवतो प्रतिभासो एम अहीं कह्युं छे.
सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप मोक्षमार्गनी पर्यायनो आत्मा कर्ता थाय छे, पण त्यां कर्मनो उदयना अभावनो जीव कर्ता छे एमनथी. तेम पोतानी निःसंसार अवस्थाने जीव भोगवे छे ते समये कर्मना अभावने पण भोगवे छे एम नथी. अरे भाई! अनादि काळथी जषीवे पोतानी स्वतंत्र चीज तरफ द्रष्टि करी नथी. सूक्ष्मपणे विचारीए तो असंसार अवस्थामां एटले साधकनी मोक्षमार्गनी दशामां आ व्यवहारनो विकल्प जे निमित्तपणे सहचर छे तेनो कर्ता (के भोक्ता) जीव नथी अने ए व्यवहारनो विकल्प आत्मानी निर्मळ पर्यायनो कर्ता नथी.
वर्तमानमां मोटी गरबड चाले छे. मोटो भाग एम माने छे के निमित्तथी (कर्मथी) थाय अने निमित्तने भोगवे पण एम छे नहि. विकारथी अवस्था पोताना स्वकाळे पोताथी थाय छे. तेनो जीव कर्ता अने भोक्ता पोते पोताथी स्वतंत्र छे. ए ज प्रमाणे मोक्षमार्गनी पर्यायने स्वाश्रयपूर्वक पोते स्वतंत्रपणे करे छे तेथी एनो कर्ता अने भोक्ता जीव पोते पोताथी स्वतंत्र छे. आत्मा चैतन्यमूर्ति त्रिकाळ आनंदस्वरूप भगवान छे. एनी द्रष्टि अने रमणता करतां जे अतीन्द्रिय आनंद प्रगट थयो तेनो