समयसार गाथा ८३ ] [ १८३
भोक्ता आत्मा छे, पण तरनो भोक्ता नथी. अज्ञानी पण शरीर आदि परने भोगवतो नथी. आ लाडु, लापसी, मैसुब ईत्यादि खाती वखते जीव पोताना रागने भोगवे छे पण ए चीजने (लाडु वगेरेने) भोगवतो नथी. आ भेदज्ञाननी अंतरनी वात छे, भाई! आवो अंतरमा निर्णय कदी कर्यो नहि अने विकार कर्मथी थाय अने कर्म मार्ग आपे तो समकित आदि निर्विकारी दशा थाय एम ते मान्युं छे पण ए बधी बधी जूठी मान्यता छे.
कहे छे-भाव्यभावकभानो अभाव होवाथी परनो आत्मा भोक्ता नथी. भाव्य एटले भोगववा लायक अने भावक एटले भोगवनार. जड कर्म भोगववा लायक अने आत्मा एनो भोगवनार-एवा भावनो अभाव छे. आत्म भावक अने कर्मनो उदय अने शरीरनी अवस्था भोगववा योग्य-एवा भावनो अभाव छे. शरीरनी बिमारी के रोगनी अवस्थाने आत्माने भोगवे छे एम छे ज नहि. ते समये जे राग छे ते रागनो मिथ्याद्रष्टि जीव कर्ता अने भोक्ता छे. जुओ, नरकमां उष्णता एटली छे के ए उष्णतानो एक कण अहीं आवे तो दश योजनमां रहेलां मनुष्यनां मरण थई जाय. आवी उष्णतानो भोक्ता आत्मा नथी केमके उष्णता परद्रव्यनी पर्याय छे. अहाहा...! ए उष्णताना निमित्ते दश जोजनमां स्थित मनुष्यना देह भस्म थई जाय पण ए देहनी भस्म थवानी जे क्रिया थई ते देहथी पोताथी थई छे, अग्नि आवी माटे ते क्रिया थई छे एम नथी. बहु सूक्ष्म वात, भाई!
अरे! लोकोए स्थूळ एवा व्यवहार अने निमित्तने प्रधान मानीने आत्मानी स्वतंत्रता खोई नाखी छे. अहीं कहे छे-भाव्यभावकभावना अभावने कारणे परभाव वडे परभावनो अनुभव थयो अशकय छे. जीव पोते करेला रागभावनो अनुभव करे छे पण ते रागद्वारा निमित्तनो पण अनुभव करे छे एम नथी. परभाव एटले शरीर कर्म वगेरेनो आत्मा वडे अनुभव थाय ए अशकय छे. कर्मनो अनुभाग एम जडनी पर्याय छे, ते आत्माने भोगववो पडे छे ए वात यथार्थ नथी.
प्रश्नः– कर्मनो विपाक जीव अनेभवने एम गोम्मटसारमां आवे छे ने?
उत्तरः–
ज्ञानावरणीय कर्म ज्ञानने रोके. पण ए तो निमित्तनुं कथन छे. परद्रव् जीवना ज्ञानने रोके एम छे नहि. पोतानी ज्ञानपर्यायमां पोते हीणपणे परिणमे छे. तेमां ज्ञानावरणीय कर्मनो उदय निमित्त छे, बस. निमित्ते ज्ञान हीण कर्युं छे एम नथी. तथा निमित्तने आत्मा भोगवे छे एम नथी. आत्मा समयसारनी पर्यायनो स्वतंत्र कर्ता थईने पोतानी पर्यायने भोगवे छे.
जुओ, भोगना काळमां स्त्रीना शरीरने जीव भोगवे छे एम कहो तो ए जूठी