Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१८४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४

वात छे. शरीर तो जड माटी छे. एने आत्मा भोगवी शकतो नथी. परंतु ते समये जे विकारी भाव थाय तेने ते भोगवे छे पोतानो विकारी भावअने माने के जड स्त्रीनुं शरीर, लक्ष्मी आदि परने भोगवुं छुं तो ते तद्दन विपरीत द्रष्टि छे. अहा! अज्ञानीने परपदार्थमां सुखनी (मिथ्या) कल्पनां छे; ते ते कल्पनाने भोगवे छे, परपदार्थने नहि.

खरेखर परपदार्थमां सुख छे ज नहि. धर्मी समकिती जीवने पैसा, आबरू, स्त्री ईत्यादि परमांथी सुखबुद्धि उडी गई छे. परमां-रागमां, लक्ष्मीमां, स्त्रीसंगमां सुख नथी एम एने निश्चय थयो छे. ए तो माने छे के त्रिकाळ आनंदस्वरूप मारुं स्वरूप छे अने एना आश्रये प्रगट जे अतीन्द्रिय आनंद तेनो हुं भोक्ता छुं. सम्यग्दर्शनमां ज्ञानीने सत्नुं दर्शन थयुं छे. सत नाम पूर्णानंदनो नाथ चैतन्यस्वभावमय वस्तु जे त्रिकाळ सत्नुं छे तेनां प्रतीति अने ज्ञान थयां छे. अहाहा..! सम्यक् श्रद्धान-ज्ञाननी एनी एक समयनी पर्यायमां परिपूर्ण वस्तुनी प्रतीतिमां अने एनुं ज्ञान आव्यां छे. परिपूर्ण वस्तु पर्यायमां आवी नथी पण एनुं समार्थ्य प्रतीतिमां अने ज्ञानमां आव्युं छे. आवो समकिती जीव त्रिकाळ आनंदस्वरूप स्वयंज्योति सुखधाम एवा भगवान आत्माना आनंदने भोगवे छे.

ज्ञानीने साधकदशामां रागनुं जे परिणमन छे ते द्रष्टिनो विषय नथी. द्रष्टि अने द्रष्टिनो विषय तो अभेद निर्विकल्प छे. अभेद चीजनी द्रष्टि थतां साथे जे ज्ञान थयुं ते ज्ञाननी पर्यायमां तेने क्षणेक्षणे जे विकल्प उठे छे तेने ते जाणे छे. आटलुं रागनुं परिणमन छे एम ते जाणे छे. एटले अंशे ते रागने भोगवे पण छे. छतां राग भोगववा लायक छे एम एने बुद्धि नथी. एकाकोर कहो छो ज्ञानी आनंदने भोगवे छे अने वळी बीजी बाजु कहो छो रागने भोगवे छे-एम आ केवी वात! भाई! वस्तुद्रष्टिनी अपेक्षाए ज्ञानी (आत्मा) रागनो कर्ता नथी, भोक्ता पण नथी. परंतु द्रष्टिी साथे जे ज्ञान थयुं छे ते ज्ञान त्रिकाळने पण जाणे छे अने पर्यायमां जेटलुं रागनुं परिणमन छे तेने पण जाणे छे. जेटलुं रागनुं परिणमन छे तेटला अंशे पोते रागनो कर्ता-भोक्ता छे. राग करवा लायक अने भोगववां लायक छे एम ज्ञानीने बुद्धि नथी. पण रागनुं परिणमन छे ए अपेक्षाए ते रागने भोगवे छे. आम जे अपेक्षाए ज्यां जेम वात होय त्यां ते यथार्थ समजवी जोईए.

द्रष्टि अने द्रष्टिना विषयनी अपेक्षाए ज्ञानी आनंदनो भोक्ता छे. आत्माना स्वभावमां विकार करे एवी कोई शक्ति नथी. तेथी स्वभावनी अपेक्षाए निश्चयथी आत्मा रागनो कर्ता नथी, भोक्ता पण नथी. परंतु पर्यायनुं ज्ञान करे तो पर्यायमां जे रागनुं परिणमन छे ते पोताने एम ज्ञान जाणे छे. तथा पोतानी पर्यायमां जे हरख-शोक थाय छे तेने पोते भोगवे छे एम पण ज्ञानी जाणे छे. पर्यायमां जे राग छे तेने कर्म