समयसार गाथा ८३ ] [ १८प
करे छे अने कर्म भोगवे छे एम (एकांते) नथी. ज्ञान अपेक्षाए ज्ञानी रागनो पण भोक्ता छे. परंतु परनो भोक्ता कदीय नथी. प्रवचनसारमां नयअधिकारमां द्रष्टांत आप्युं छे के जेम रंगरेज रंगकाम करे छे तेम जो के ज्ञानी स्वभावनी द्रष्टिए स्वभावनो भोक्ता छे तोपण कमजोरथी जे रागनुं परिणमन छे तेनो करनार पोते छे; करवा योग्य छे एम नहि पण परिणमन छे ते अपेक्षाए कर्ता-भोक्ता छे. तेथी जो कोई एकांते एम कहे के ज्ञानीने रगनुं- दुःखनुं वेदन छे ज नहि तो ते यथार्थ नथी.
स्वभावसन्मुख थतां सम्यक्दर्शन-ज्ञानपूर्वक जे अतीन्द्रिय आनंद प्रगट थयो ते आनंदनो ज्ञानी भोक्ता छे. पण साथे जेटलुं रागनुं दुःख छे तेने पण ते कथंचित् भोगवे छे. परनो-शरीरीनो के कर्मनो ते कदीय भोक्ता नथी. आवो भगवाननो मार्ग छे. बीजी रीते कहीए तो आत्मा निश्चयथी मोक्षमार्गमांनो कर्ता अने भोक्ता छे. पण ते रागनो कर्ता अने भोक्ता (सर्वथा) छे ज नहि एमकोई माने तो ते एम नथी. निश्चयनी द्रष्टिए जीव रागनो कर्ता अने भोक्ता नथी केमके वस्तुस्वभावमां विकार करे एवी कोई शक्ति नथी. वळी बधी शक्तिओ निर्विकारी छे तेथी निर्विकारी पर्यायपणे थवुं ए ज एनुं स्वरूप छे तोपण पर्यायमां जे विकार थाय छे तेनो परिणमननी अपेक्षाए कर्ता अने भोक्ता पोते छे एम ज्ञानी यथार्थपणे जाणे छे.
द्रष्टिनो विषय पर्याय नथी. द्रष्टिनो विषय तो त्रिकाळी अभेद चीज छे. पण तेथी जो कोई एम कहे के पर्याय छे ज नहि तो एम वात नथी. पर्याय् न होय तो संसार, मोक्षमार्ग अने सिद्धपद-कांई सिद्ध नहि थाय. आ बधी पर्याय तो छे! हा, भगवान आत्मा परिपूर्ण चीज छे ते पर्यायमां आवे नहि ध्रुव छे ते पर्यायमां कयांथी आवे? पण पर्याय पर्यायपणे नथी एम छे? ना, एम नथी. भगवान पूर्णानंदनो नाथ सामान्य-सामान्य एकरूप वस्तु ते विशेषमां-पर्यायमां केम आवे? विशेषमां आवे तो पर्यायनो बीजे समये नाश थतां एनो (द्रव्यनो) पण नाश थई जाय, केमके पर्याय प्रतिसमय उत्पाद-व्ययरूप छे. समयसार गाथा ३२०नी आचार्य जयसेननी टीकामां आवे छे के ध्यान जे मोक्षमार्गनी पर्याय छे तेनाथी आत्मा कथंचित् भिन्न छे.
अहाहा...! द्रव्य जे त्रिकाळी ध्रुव छे ते पोतानी के परद्रव्यनी पर्यायनुं कर्ता नथी, राग छे ते पण परद्रव्यनी अवस्थानुं कर्ता नथी, द्रव्यद्रष्टि थतां जे निर्मळ पर्याय प्रगट थई ते रागनी कर्ता नथी अने राग निर्मळ पर्यायनो कर्ता नथी, तथा द्रव्य निर्मळ पर्यानुं कर्ता नथी. आवो वीतरागनो अलौकिक मार्ग छे! अहो! दिगंबरदर्शन ए ज जैनदर्शन छे. संप्रदायवाळाने दुःख लागे पण मार्ग तो आ एक ज छे. भाई! दिगंबर कोई पक्ष के वाडो नथी. वस्तुनु स्वरूप ते दिगंबर धर्म छे.
अहाहा...! आ जैनदर्शनमां एम कहे छे के प्रभु! तुं परनो कर्ता अने भोक्ता