१८६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
नथी. शरीरनो कर्ता अने शरीरनो भोक्ता तुं नथी. एवी ज रीते कर्मनो कर्ता-भोक्ता पण तुं नथी. तथा कर्मनी पर्याय तारा (आत्मानाा) विकारी परिणमनी कर्ता अने भोक्ता नथी. कर्मनी पर्याय भावक अने आत्मानो विकार भाव भाव्य-एम नथी. अहो! आवो वीतरागनो मार्ग भगवान सर्वज्ञदेवथी सिद्ध थयेलो छे. जेना मतमां सर्वज्ञ नथी तेमां धर्म नथी. धर्मनुं मूळ सर्वज्ञ छे.
प्रवचनसार गाथा ८० मां कह्युं छे के- जे कोई आत्मा सर्वज्ञ परमेश्वर अरिहंत प्रभुना द्रव्य-गुण-पर्यायने जाणे छे ते पोताना आत्माने जाणे छे. अहाहा..! सर्वज्ञ भगवानने केवळज्ञान छे एवो निर्णय करनारी पर्याय पोताना सर्वज्ञस्वभाव तरफ झूकी जाय छे अने त्यां पोताना दर्शनमोहनो क्षय थई जाय छे अने सम्यग्दर्शननी पर्याय प्रगट थाय छे. आवो सर्वज्ञनो मार्ग छे. जेनामां सर्वज्ञ नथी एमां धर्म संभवित नथी.
अहीं कहे छे के संसारसहित अथवा संसाररहित दशामां परनो भोक्ता आत्मा नथी. संसारदशामां पोताना रागनो भोक्ता छे अने निःसंसार दशामां पोतानी निर्विकल्प निर्मळ अनुभूतिनो भोक्ता छे. परंतु कोई अवस्थामां परनो भोक्ता नथी. अज्ञानभावे पण परनो भोक्ता नथी.
द्रव्यमां सामान्य अने विशेष एम बे धर्मो स्वतंत्र सिद्ध करवा होय त्यारे एम आवे द्रव्य अनुभूतिनी पर्यायने पण करतुं नथी. ध्रुव त्रिकाळी छे ते उत्पाद-व्यय करतुं नथी. ज्यारे अहीं तो परनो भोक्ता नथी परंतु पोताना रागनो भोक्ता अथवा अनुभूतिनी पर्याय भोक्ता आत्मा छे एम सिद्ध करवुं छे. भगवान! तारी अनुभूतिनो तुं भोक्ता छे पण कर्म अने शरीरनो तुं भोक्ता नथी.
द्रष्टि अपेक्षाए अनुभूति जेने प्रगट थई छे एवो ज्ञानी रागनो भोक्ता नथी. तथापि अल्पकाळमां जेमने केवळज्ञान थवानुं छे एवा भावलिंगी संत छठ्ठ गुणस्थाने होय त्यारे जाणे छे के जेटलुं रागनुं परिणमन थई रह्युं छे तेनो कर्ता अने भोक्ता हुं पोते छुं; पण परनो हुं कर्ता के भोक्ता नथी. संसार सहित अथवा संसार रहित अवस्थामां पोताने एकने ज अनुभवनो प्रतिभासो, अन्यने एटले कर्म आदिने अनुभवतो न प्रतिभासो एम अहीं एम अहीं कहे छे. आवो सूक्ष्म गंभीर मार्ग छे. एनी गंभीरता भासे नहि तो धर्म केम थाय? न थाय.
कर्मप्रकृतिना बंधना चार भेद आवे छे- प्रकृति बंध, प्रदेश, बंध, स्थिति बंध, अनुभाग बंध; प्रकृति एटले स्वभाव, प्रदेश एटले परमाणुनी संख्या, स्थिति नाम काळनी मुदत अने अनुभाव एटले फळ देवान शक्ति भाई! अनंद अने दुःख ते कर्मनुं फळ छे एम नथी.
प्रश्नः– विपाको अनुभवः एम तत्त्वार्थसूत्रमां आवे छे ने?