समयसार गाथा ८३ ] [ १८७
आत्मान अनुभवतो नथी. जीव रागनो अनुभव करे छे अथवा पोतानी अनुभूतिनो अनुभव करे छे, पण परनो कदीय अनुभव करतो नथी.
अरे! वाणिया आखो दि’ वेपार-धंधामां रच्या-पच्या रहे एटले आवी वात कठण पडे, परंतु भाई! वेपार-धंधा कोई आतमा करतो नथी. आत्मा व्यापक अने वेपारादि काम एनुं व्याप्य एम त्रणकाळमां नथी. परनी पर्यायने कोण करे? लक्ष्मीनी लेवदेवडना समये जे भाव थाय छे ते भावनो जीव कर्ता छे पण लेवडदेवडनी जे क्रिया थाय एनो कर्ता आत्मा नथी. अज्ञानी विकल्पनी जाळनो कर्ता-भोक्ता थाय छे पण परनो कर्ता-भोक्ता कदीय नथी. ज्यारे द्रव्य अने पर्याय एबे वच्चे भेद करवो होय त्यारे तो द्रव्य पर्यायनुं पण कर्ता नथी, पर्यायनी कर्ता छे एम आवे. भाई! आ तो भेदज्ञाननी वात छे; सिद्धि छे. समयसार- कळशमां कह्युं छे ने के-
अस्यैवाभावतो बद्धा बद्धा ये किल केचन।। १३१।।
अनंतकाळमां जेटला सिद्ध थया ते बधा भेदविज्ञानथी सिद्ध थया छे; रागथी व्यवहारथी सिद्ध थया छे एम नथी. व्यवहारथी भिन्नपणारूप ज्ञान करीने सिद्ध थया छे. अहीं तो पोतान परथी भिन्न करवानी वात छे. रागथी भिन्न पडीने जेणे स्वाश्रये निर्मळ पर्याय प्रगट करी ते साधक छे. परंतु राग-व्यहार मने लाभ कर्ता छे एम राग साथे जे एकता करेतेने भेदज्ञान नथी अने ते चारगतिरूप संसारमां रखडशे.
परथी भिन्न अने पोताथी अभिन्न एनुं नाम भेदज्ञान छे. व्यवहारथी-रागथी भिन्न थवुं ते भेदज्ञान छे, व्यवहारना सहारे भेदज्ञान नथी. जेनाथी भिन्न पडवुं छे ते व्यवहार भेदज्ञाननुं साधन केम थाय? न ज थाय. जे स्वभावसन्मुख थाय छे ते व्यवहारथी भिन्न पडीने अंदर जाय छे. अरे भाई! व्यवहार तो शुभराग छे, उदयभाव छे, संसार छे, झेर छे, अमृत-स्वरूप भगवान आत्माथी विपरीत स्वभावरूप छे. मोक्ष अधिकारमां प्रतिक्रमण, प्रतिसरण, परिहरण आदि शुभभावने विषकुंभ एटले झेरनो घडो कह्यो छे सम्यग्द्रष्टिनो व्यवहार विषकुंभ छे.
अज्ञानीना शुभरागने व्यवहारने कहेवातो नथी. रागथी भिन्न पडी जेणे स्वभावनो अनुभव कर्यो तेने जे राग बाकी छे एने व्यवहार कहे छे. जे शुभरागमां ज सावधान छे एवा अज्ञानीने व्यवहार केवो? एने तो व्यवहारमूढ कह्यो छे. समयसार गाथा ४१३मां कह्युं छे के-‘जेओ खरेखर हुं श्रमण छुं- एम द्रव्यलिंगमां ममकार वडे मिथ्या अहंकार करे छे तेओ अनादिरूढ व्यवहारमां मूढ वर्तता थका, प्रौढ विवेकवाळा निश्चयनय पर अनारूढ वर्तता थका, परमार्थसत्य भगवान समयसारने देखता नथी-अनुभवता नथी.’