१८८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
भाई! रागनी मंदता तो अनादिकाळथी करे छे. निगोदमां पण क्षणमां शुभ अने क्षुणमां अशुभ थाय छे. एमां नवुं शुं छे? जेने शुभरागनी-व्यवहारने रुचि छे तेने पोताना आत्मानो द्वेष छे. स्तुतिकारे भगवान संभवनाथनी स्तुतिमां कह्युं छे- ‘द्वेष अरोचक भाव’ अहाहा...! त्रणलोकनो नाथ सच्चिदानंद प्रभु भगवान अंदर बिराजे छे. तेनो जेने आदर अने सत्कार नथी अने रागनो आदर छे तेन पोताना प्रत्ये ज द्वेष छे. बापु! दुनिया माने छे एनाथी आ तद्दन जुदी वात छे. जेने निज स्वभावनी रुचि थई तेने व्यवहारनी- शुभरागनी रुचि होई शकती नथी. अहीं कहे छे. - संसाररहित अथवा संसाररहित दशामां आत्मा पोताने एकने ज अनुभवतो प्रतिभासो, अन्यने अनुभवतो न प्रतिभासो. जीव कां तो रागने अनुभव कां तो पोतानी अनुभूतिने अनुभवे; पण परने ते अनुभवे छे एम छे ज नहि. शेरडीना रसने जीव अनुभवे छे. एम छे ज नहि. तेना प्रति एने जे राग छे ते रागने ते अनुभवे छे. मीरनी तीखाशनो जीवने अनुभव नथी. तीखाश तो जड छे. पण ते ठीक छे एवो जे एना प्रत्ये राग छे तेने जीव अनुभवे छे. वींछी के सापना करडनो (डंखनो) जीवने अनुभव नथी, ए तो जडनी पर्याय छे. ते वखते अठीकपणानो जे द्वेषनो भाव थाय छे त द्वेषने जीव अनुभव छे. साकरनी मीठाश अने अफीणनी कडवाशनो जीव भोक्ता नथी. जे ते समये जे रा-द्वेषादि विकारी थाय छे ते विकारी भावनो जीव भोक्तानो जीव भोक्ता थाय छे. आवी वात छे. * गाथा ८३ः भावार्थ उपरनुं प्रवचन *
‘आत्माने परद्रव्य-पुद्गलकर्म-ना निमित्तथी संसार -निःसंसार अवस्था छे. ते अवस्थारूप आत्मा पोते ज परिणमे छे. तेथी ते पोतानो ज कर्ता-भोक्ता छे. पुद्गलकर्मनो कर्ता-भोक्ता तो कदी नथी. पुद्गलकर्मना निमित्तथी संसार अवस्था छे. जुओ, अहीं ‘निमित्तथी’ एम कह्युं छे. एना अर्थ शुं? एटलो ज के निमित्तथी छे, निमित्त होय छे-बस एटली वात छे. निमित्त वडे अहीं जीवमां विकार करायो छे एम अर्थ नथी. विकारनी-संसारनी आदि-मध्य-अंतमां निमित्त-कर्म प्रसर्युं छे एम नथी. जीवमां मिथ्याच्वादि संसार अवस्था पोताथी छे त्यारे कर्म निमित्त छे बस एटलुं. ते ज प्रमाणे आत्मामां संसाररहित अवस्था थाय छे एमां कर्मनो अभाव निमित्त छे. पण कर्मनो अभाव छे माटे मोक्षमार्गनी पर्याय जीवने थई छे एम नथी. सम्यग्दर्शन- ज्ञान-चारित्ररूप मोक्षमार्गनी वीतराग अवस्थानी आ-मध्य-अंतमां आत्मा छे. आत्माए पोते स्वतंत्रपणे कर्ता थईने मोक्षमार्गनी पर्याय उत्पन्न करी छे. व्यवहारनयना परिणाम छे तो मोक्षमार्गनी पर्याय प्रगटी छे एम पण नथी, केमके मोक्षमार्गनी पर्यायनी आदिमां व्यवहाररत्नत्रयनो राग नथी, पण आत्मा छे.